घरेलू मांग से प्रोडक्शन में उछाल
फरवरी में भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने ज़बरदस्त मज़बूती दिखाई। परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) 56.9 के स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले चार महीनों में सबसे ज़्यादा है। इस तेज़ी का बड़ा श्रेय घरेलू मांग को जाता है, जिसके चलते नए बिज़नेस की बुकिंग अक्टूबर के बाद सबसे तेज़ रफ़्तार से बढ़ी। कंपनियों के प्रतिनिधियों का कहना है कि मांग में मज़बूती, असरदार मार्केटिंग रणनीतियों और ग्राहकों की बढ़ती ज़रूरतें इस उछाल के मुख्य कारण रहे। प्रोडक्शन की ग्रोथ भी तेज़ हुई, जो लंबी अवधि के औसत से ऊपर निकल गई। ऐसा कंपनियों की कार्यकुशलता में सुधार, अच्छी मांग और तकनीकी निवेश की वजह से संभव हुआ। बढ़ती मांग और प्रोडक्शन को पूरा करने के लिए मैन्युफैक्चरर्स ने कच्चे माल की खरीद और स्टॉक (इन्वेंट्री) में भी इज़ाफ़ा किया। Nifty India Manufacturing इंडेक्स का P/E रेश्यो 28.64 है।
एक्सपोर्ट्स पर सुस्ती, रोज़गार में हल्की बढ़ोतरी
जहां घरेलू मांग तेज़ी ला रही है, वहीं नए एक्सपोर्ट ऑर्डर्स में लगातार गिरावट एक चिंता का विषय बनी हुई है। इन ऑर्डर्स में पिछले 17 महीनों की सबसे धीमी रफ़्तार से बढ़ोतरी देखी गई, जो लंबी अवधि के औसत के करीब आ गई है। एशिया, यूरोप, मिडिल ईस्ट और अमेरिका से कुछ मामूली बढ़ोतरी तो हुई, लेकिन यह वैश्विक मांग की सुस्ती को पूरी तरह से दूर नहीं कर पाई। इसी का नतीजा है कि फैक्ट्रियों में रोज़गार में हल्की, पर चार महीनों की सबसे तेज़ रफ़्तार से बढ़ोतरी हुई। यह सीमित भर्ती बढ़ते लंबित ऑर्डर्स (outstanding business volumes) के चलते की गई, जो काम के बढ़ते बोझ को दर्शाता है। यह जुलाई 2025 जैसे उच्च विकास की अवधि के विपरीत है, जब PMI 59.1 पर पहुंच गया था।
वैश्विक परिदृश्य और क्षेत्रीय तुलना
भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर घरेलू स्तर पर भले ही मज़बूत दिख रहा हो, लेकिन वैश्विक स्तर पर तस्वीर मिली-जुली है। वियतनाम का मैन्युफैक्चरिंग PMI फरवरी 2026 में 54.3 पर पहुंचा, जहां प्रोडक्शन में 18 महीनों की तेज़ी दिखी। थाईलैंड का PMI भी 53.5 तक बढ़ा। वहीं, चीन का PMI जनवरी 2026 में 50.3 रहा, जिसमें नए एक्सपोर्ट ऑर्डर्स की वापसी से थोड़ा सुधार दिखा। दुनिया भर में बढ़ती ब्याज दरें, भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन की दिक्कतें अनिश्चितता पैदा कर रही हैं, जिससे एक्सपोर्ट सेक्टर प्रभावित हो रहा है।
जोखिम और भविष्य का नज़रिया
सिर्फ घरेलू मांग पर निर्भर रहना, भले ही अभी मज़बूती दे रहा हो, लेकिन यह एक बड़ा जोखिम भी बन सकता है अगर वैश्विक हालात नहीं सुधरते। एक्सपोर्ट ऑर्डर्स का लगातार धीमा पड़ना, जो 2025 के मध्य से जारी है, वैश्विक आर्थिक मंदी के प्रति भेद्यता (vulnerability) को दर्शाता है। इसका रोज़गार सृजन पर भी असर पड़ सकता है, जो अभी सीमित है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का GDP में योगदान लगभग 16-17% है, जबकि वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में भारत की हिस्सेदारी महज़ 2% है। यह दर्शाता है कि ग्रोथ की काफी गुंजाइश है, लेकिन साथ ही बाहरी मांग के झटकों के प्रति संवेदनशीलता भी है।
आगे क्या उम्मीद करें?
कंपनियां अगले साल के लिए उत्पादन में ग्रोथ का अनुमान लगा रही हैं, 16% कंपनियां ग्रोथ की उम्मीद कर रही हैं। अनुकूल मांग की परिस्थितियाँ और मार्केटिंग के प्रयास सेक्टर को मज़बूती दे सकते हैं। विश्लेषकों को सरकार की नीतियों और मज़बूत खपत (consumption) का समर्थन जारी रहने की उम्मीद है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में FY26 में 7% ग्रोथ का अनुमान है। हालांकि, इस ग्रोथ की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि घरेलू मांग वैश्विक चुनौतियों का कितना सामना कर पाती है और एक्सपोर्ट बाज़ार कब तक सुधरते हैं।