इंडिया का मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर (MEI) सेक्टर सामान्य रिकवरी साइकल से आगे बढ़कर मजबूत ग्रोथ की ओर बढ़ रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली छमाही में नेट एम्प्लॉयमेंट ग्रोथ 6.6% रहने का अनुमान है, जो पिछले पीरियड के 5.5% से अधिक है। यह सेक्टर अब देश के टॉप-3 एम्प्लॉयर्स में शुमार हो गया है, जिसका मुख्य कारण मजबूत इंडस्ट्रियल निवेश और सरकार की एक्टिव योजनाएं हैं। नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन, क्लीन-टेक मैन्युफैक्चरिंग पहलों और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेटिव (PLI) स्कीम्स जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स इस पॉजिटिव ट्रेंड को बढ़ावा दे रहे हैं। केवल सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट्स से 2026 से 2028 के बीच करीब 10 लाख नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है। इसके साथ ही, इंडस्ट्री 4.0 टेक्नोलॉजीज का बढ़ता इस्तेमाल प्लांट ऑपरेशंस और इंजीनियरिंग डिजाइन जैसे क्षेत्रों में हाई-स्किल और डिजिटल रोल्स की डिमांड बढ़ा रहा है।
सरकारी नीतियों का बड़ा हाथ
यह महत्वाकांक्षी हायरिंग लक्ष्य सीधे तौर पर सरकारी योजनाओं और बदलते इंडस्ट्रियल परिदृश्य से जुड़े हैं। PLI स्कीम, जो भारत की मैन्युफैक्चरिंग रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, का उद्देश्य डोमेस्टिक प्रोडक्शन को बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को विभिन्न 14 सेक्टर्स में ग्लोबल स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना है। शुरुआती अनुमान बताते हैं कि इस स्कीम ने निवेश और रोजगार सृजन में वृद्धि की है, हालांकि कुछ विश्लेषणों से पता चलता है कि अत्यधिक ऑटोमेटेड फैक्ट्रियों में रोजगार सृजन उम्मीद से कम रहा है। वहीं, नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन (NIP) और पीएम गति शक्ति मास्टर प्लान जैसी पहलों के तहत चल रहे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (EPC) में भारी मांग पैदा कर रहे हैं। इन प्रोजेक्ट्स से 2030 तक 2.5 करोड़ से अधिक नौकरियां पैदा होने का अनुमान है। इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV), रिन्यूएबल एनर्जी और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स में ग्रोथ खास तौर पर मजबूत है। अकेले EV सेक्टर से 2030 तक 50 लाख डायरेक्ट जॉब्स की उम्मीद है, जबकि रिन्यूएबल एनर्जी पहले से ही एक महत्वपूर्ण रोजगार प्रदाता है।
मुख्य चुनौतियां: स्किल्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और लागत
इन सकारात्मक हायरिंग संभावनाओं के बावजूद, यह सेक्टर कई प्रमुख चुनौतियों का सामना कर रहा है। स्किल्ड वर्कर्स की व्यापक कमी एक बड़ी बाधा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, लगभग 80% भारतीय एम्प्लॉयर्स को स्किल्ड वर्कर्स ढूंढने में कठिनाई हो रही है, जो कि वैश्विक औसत से काफी अधिक है। विशेष रूप से रोबोटिक्स, इंडस्ट्रियल IoT, AI और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग में प्रशिक्षित लोगों की कमी है, जिसके लिए बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों की आवश्यकता है। भारत को 2030 तक लगभग 10 करोड़ स्किल्ड वर्कर्स की जरूरत है, लेकिन वर्तमान कार्यबल का केवल एक छोटा हिस्सा ही औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त है। इंडस्ट्री 4.0 दक्षता का वादा करता है, लेकिन इसे अपनाने की प्रक्रिया अभी शुरुआती दौर में है, जिसमें उच्च लागत, छोटे और मध्यम व्यवसायों (MSMEs) में कम जागरूकता और खराब इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी समस्याएं इसकी क्षमता को सीमित कर रही हैं। इसके अलावा, इंफ्रास्ट्रक्चर गैप्स, उच्च इनपुट लागत, अविश्वसनीय बिजली आपूर्ति और लॉजिस्टिक्स की दिक्कतें मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट के लिए लगातार चुनौती बनी हुई हैं। सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च के बावजूद, धीमी प्रगति और राज्यों के बीच एकीकरण की कमी से देरी हो रही है। वर्कर्स के लिए प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है, क्योंकि EV और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे सेक्टर्स पारंपरिक सेक्टर्स की तुलना में अधिक वेतन वृद्धि प्रदान कर रहे हैं, जिससे कुशल पेशेवरों का पलायन हो सकता है।
