लागतों का बढ़ता बोझ
FICCI (फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) के सर्वे के मुताबिक, इस तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का आउटपुट तो बढ़ा है, लेकिन इस ग्रोथ की लागत तेजी से बढ़ी है। 93% कंपनियों ने उत्पादन स्तर को हाई या अनचेंज्ड बताया है, जो पिछली तिमाही से थोड़ा बेहतर है। घरेलू मांग (domestic demand) काफी मजबूत बनी हुई है, 89% रेस्पोंडेंट्स को अगले क्वार्टर में भी ऑर्डर्स बढ़ने की उम्मीद है। एक्सपोर्ट (exports) को लेकर भी तस्वीर स्टेबल है, लगभग 80% निर्माता अंतरराष्ट्रीय बिक्री में वृद्धि या स्थिरता देख रहे हैं। नौकरी के मौके भी सुधरे हैं, 41% कंपनियाँ अगले तीन महीनों में वर्कफ़ोर्स बढ़ाने की योजना बना रही हैं। फाइनेंस तक पहुँच आसान है, 86% से ज़्यादा कंपनियों ने इसे पर्याप्त बताया है, जिसमें औसत ब्याज दर 8.85% रही।
मार्जिन पर सीधा असर
लेकिन, इन सकारात्मक संकेतों के बावजूद, मुनाफे को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं। पिछली तिमाही के 57% के मुकाबले, लगभग 70% मैन्युफैक्चरर्स ने अपनी सेल्स के मुकाबले प्रोडक्शन कॉस्ट को बढ़ता हुआ बताया है। इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह रॉ मैटेरियल के दाम, कमजोर होता रुपया (Indian Rupee), और लॉजिस्टिक्स, पावर व यूटिलिटीज के बढ़ते खर्चे हैं। ग्लोबल लेवल पर भी इनपुट कॉस्ट अप्रैल 2026 में 44-महीने के हाई पर पहुँच गई थी, जो एनर्जी और शिपिंग की दिक्कतों से और बढ़ गई है। ये बढ़ता लागत का दबाव भारत में निर्माताओं के लिए रेवेन्यू ग्रोथ को सीधे मुनाफे में बदलना मुश्किल बना रहा है।
क्षमता उपयोग में गिरावट
Q4 FY26 में मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का कुल उपयोग (capacity utilization) थोड़ा गिरकर लगभग 72% पर आ गया है। यह पिछले कुछ समय से देखे जा रहे औसत 75% (जनवरी 2026) और 77.7% (Q4 FY25) से कम है। सर्वे में अलग-अलग सेक्टर्स में भी बड़ा अंतर दिखा। टेक्सटाइल, अपैरल और टेक्निकल टेक्सटाइल में क्षमता उपयोग 76.4% रहा, जो सबसे ज़्यादा है। इसके बाद मेटल प्रोडक्ट्स (76%) और ऑटोमोटिव कंपोनेंट्स (75.7%) का नंबर आता है। वहीं, कैपिटल गुड्स (69%) और इलेक्ट्रॉनिक्स व इलेक्ट्रिकल (68%) सेक्टर्स में उपयोग काफी कम रहा, जो इन अहम हिस्सों में अंडरपरफॉरमेंस और बेकार पड़ी एसेट्स की ओर इशारा करता है।
विस्तार में रुकावटें
निर्माताओं ने क्षमता विस्तार (capacity expansion) में कई बाधाओं का जिक्र किया, जैसे ग्लोबल अनिश्चितता, व्यापार की सीमाएं, लेबर की कमी, रॉ मैटेरियल की किल्लत और रेगुलेटरी हर्डल्स। ये मुद्दे, ग्लोबल सप्लाई चेन की दिक्कतें और अप्रैल 2026 में देखे गए लंबे लीड टाइम के साथ मिलकर एक चुनौतीपूर्ण ऑपरेटिंग माहौल बना रहे हैं। भारत का मैन्युफैक्चरिंग PMI अप्रैल 2026 में थोड़ा बढ़कर 54.7 हुआ, लेकिन नए ऑर्डर्स और आउटपुट ग्रोथ पिछले लगभग चार सालों में दूसरी सबसे धीमी रही। यह दर्शाता है कि लागत के दबाव के बावजूद डिमांड में मोमेंटम कम हुआ है।
आगे का रास्ता
आने वाले समय में, भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से 5% ग्रोथ की उम्मीद है। सरकारी पहलें जैसे PLI स्कीम्स और मैन्युफैक्चरिंग हब को बढ़ावा देना लंबी अवधि के विकास में मदद करेंगे। हालांकि, नज़दीकी भविष्य में मजबूत डिमांड को बढ़ती इनपुट कॉस्ट के दबाव के साथ बैलेंस करना होगा। करंसी का उतार-चढ़ाव भी एक फैक्टर है, जैसे USD/INR का रेट 94.4170 के करीब रहा, जो एक्सपोर्ट को तो मदद करेगा पर इम्पोर्टेड रॉ मैटेरियल को महंगा बनाएगा।
