चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में भारत ने एक बड़ा कदम उठाया है। देश ने अपने पहले 'मेड इन इंडिया' शिपिंग कंटेनर लॉन्च किए हैं। सरकार ₹10,000 करोड़ की प्रमोशन स्कीम के ज़रिए लागत का अंतर पाटने की कोशिश कर रही है, जिससे सप्लाई चेन की सुरक्षा मज़बूत होगी।
सप्लाई चेन में बड़ी सेंध
दशकों से दुनिया भर का शिपिंग लॉजिस्टिक्स (Shipping Logistics) चीनी मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) पर निर्भर रहा है, जो दुनिया के शिपिंग कंटेनर सप्लाई का 90% से 97% हिस्सा बनाती है। अब भारत ने इस निर्भरता को कम करने के लिए घरेलू इंडस्ट्री (Domestic Industry) बनाने की शुरुआत की है।
सप्लाई चेन की मज़बूती
कोविड-19 (COVID-19) महामारी ने सिंगल कंट्री डिपेंडेंस (Single Country Dependence) की कमज़ोरी को उजागर किया था। उस समय कंटेनर की भारी कमी और महंगे शिपिंग रेट्स (Freight Costs) ने भारतीय एक्सपोर्टर्स (Exporters) और इम्पोर्टर्स (Importers) को काफी नुकसान पहुँचाया था। डोमेस्टिक कैपेसिटी (Domestic Capacity) बनाकर, सरकार ऐसे भविष्य के संकटों से भारतीय ट्रेड (Trade) को बचाना चाहती है।
सरकारी मदद और लागत में कमी
भारतीय मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) और ग्लोबल कॉम्पिटिशन (Global Competition) के बीच की खाई को पाटने के लिए, सरकार ने ₹10,000 करोड़ की 'कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग प्रमोशन स्कीम' (Container Manufacturing Promotion Scheme) लॉन्च की है। इस फंड का मकसद ज़मीन, टेक्नोलॉजी और ऑटोमेशन (Automation) से जुड़े खर्चों को कम करना है। फिलहाल, भारत में बने कंटेनर चीन की तुलना में 30% से 40% ज़्यादा महंगे हैं। इसकी मुख्य वजह चीन का दशकों का स्केल (Scale) और हाई-टेक ऑटोमेशन (Automated Production Lines) है। इस स्कीम की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स (Domestic Manufacturers) कितनी जल्दी अपनी प्रोडक्शन कैपेसिटी (Production Capacity) बढ़ाकर प्रति-यूनिट लागत को कम कर पाते हैं।
कमर्शियल पार्टनरशिप का रोल
इस पहल का एक अहम पड़ाव DCM Shriram Group और ग्लोबल शिपिंग जायंट (Global Shipping Giant) AP Moller-Maersk के बीच हुआ कोलैबोरेशन (Collaboration) है। दोनों कंपनियों ने हाल ही में उत्तर प्रदेश के दादरी में पहला लोकल एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंटेनर (Export-Import Container) दिखाया। Maersk ने तुरंत 1,000 कंटेनर का ऑर्डर देकर कमर्शियल सपोर्ट (Commercial Support) दिया है। यह कदम ज़रूरी है क्योंकि इससे मैन्युफैक्चरर्स को अपनी प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने और मार्केट में अपनी जगह बनाने का शुरुआती मौका मिलेगा।
व्यापक आर्थिक असर
कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग हब (Manufacturing Hub) के विकास से भारतीय इंडस्ट्रियल सेक्टर (Industrial Sector) पर भी पॉजिटिव असर पड़ने की उम्मीद है। इससे डोमेस्टिक स्टील (Steel), हाई-क्वालिटी कोटिंग्स (Coatings), और एडवांस वेल्डिंग (Welding) और फैब्रिकेशन (Fabrication) सर्विसेज़ की डिमांड बढ़ सकती है। लॉन्ग-टर्म में रोज़गार (Employment) और इंडस्ट्रियल ग्रोथ (Industrial Growth) की काफी संभावनाएँ हैं, लेकिन इंडस्ट्री को उन ग्लोबल प्लेयर्स (Global Players) से मुकाबला करना होगा जो लंबे समय से कम लागत पर उत्पादन कर रहे हैं। निवेशकों के लिए सरकार की सब्सिडी स्कीम (Subsidy Scheme) का असर, मैन्युफैक्चरर्स की लागत प्रबंधन क्षमता और बड़ी शिपिंग लाइन्स (Shipping Lines) से मिलने वाले अगले ऑर्डर्स (Orders) पर नज़र रखनी होगी।
