Fastener Trade पर सरकारी QCO का भारी असर: लागत बढ़ी, सप्लाई ठप, व्यापारी चिंतित

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AuthorAditya Rao|Published at:
Fastener Trade पर सरकारी QCO का भारी असर: लागत बढ़ी, सप्लाई ठप, व्यापारी चिंतित
Overview

भारत के Fastener (फास्टनर) व्यापारी एक नए सरकारी Quality Control Order (QCO) के खिलाफ लामबंद हो गए हैं। वे चेतावनी दे रहे हैं कि इस नियम से लागतें बढ़ रही हैं, सप्लाई चेन (Supply Chain) ठप हो रही है और देश भर में प्रोडक्शन (Production) बाधित हो रहा है।

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व्यापारी QCO वापस लेने की मांग पर अड़े

फास्टनर व्यापारियों ने सरकार से नए क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (QCO) को तुरंत वापस लेने की जोरदार मांग की है। उनका साफ तौर पर कहना है कि यह नियम उनके कारोबारों को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। इसके चलते लागतें तेजी से बढ़ रही हैं और सप्लाई में गंभीर बाधाएं आ रही हैं, जिसका सीधा असर देश भर में प्रोडक्शन पर पड़ रहा है।

सर्टिफिकेशन की मुश्किलों से प्रोडक्शन पर चोट

इस QCO को लेकर सबसे बड़ा ऐतराज इसके कड़े 'वन-प्रोडक्ट-वन-लाइसेंस' (एक उत्पाद, एक लाइसेंस) सिस्टम पर है। व्यापारियों का तर्क है कि फास्टनर जैसे उत्पादों के लिए यह तरीका बिल्कुल भी कारगर नहीं है। दरअसल, फास्टनर को अक्सर छोटे बैचों में और एक ही मशीनरी का इस्तेमाल करके बनाया जाता है। ऐसे में, हर बार एक नया लाइसेंस लेने की प्रक्रिया काम को दोहरा रही है, जिसमें अत्यधिक देरी हो रही है और अनिश्चितता का माहौल बन रहा है।

Federation of Indian MSMEs (FISME) के सेंट्रल एग्जीक्यूटिव कमेटी मेंबर, Shaunak Rungta ने इस समस्या को उजागर करते हुए कहा कि वर्तमान में ड्राईवॉल और चिपबोर्ड स्क्रू जैसे खास क्वालिटी वाले क्रॉस-रिसेस्ड स्क्रू की भारी कमी बनी हुई है, जो देश में उपलब्ध नहीं हैं। Rungta ने चिंता जताते हुए कहा, "QCO की वजह से मेरी फर्म का टर्नओवर (Turnover) लगभग 50% तक गिर गया है, और यदि यही हाल रहा तो कंपनी को बंद करने की नौबत आ सकती है।" उन्होंने सरकार से अपील की है कि भारतीय मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) सेक्टर को बड़े नुकसान से बचाने के लिए इस ऑर्डर को फौरन वापस लिया जाए।

मैन्युफैक्चरिंग की कॉम्पिटिटिवनेस के लिए इंपोर्ट जरूरी

Harmonised System (HS) कोड को लेकर कन्फ्यूजन के कारण पोर्ट पर होने वाली देरी से भी अनिश्चितता और ट्रांजैक्शन कॉस्ट (Transaction Cost) में बढ़ोतरी हो रही है। फास्टनर ट्रेडर Yusuf Unjahawala का कहना है कि अनिवार्य Bureau of Indian Standards (BIS) सर्टिफिकेशन (Certification) का व्यापक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।

व्यापारी इस बात पर भी जोर दे रहे हैं कि QCO से केवल कुछ चुनिंदा बड़े निर्माताओं को फायदा हो रहा है, जबकि सप्लाई चेन को सुचारू रखने वाले ट्रेडर्स को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है। फास्टनर, जिनमें बोल्ट, नट, स्क्रू, वॉशर और स्टड जैसी हजारों तरह की वैरायटी शामिल हैं, ऑटोमोटिव (Automotive) और कंस्ट्रक्शन (Construction) से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स (Electronics) और रेलवे (Railways) जैसे महत्वपूर्ण सेक्टर्स के लिए कच्चे माल का काम करते हैं।

थिंक टैंक GTRI के अनुसार, भारत सालाना लगभग USD 1.13 बिलियन (लगभग ₹9,400 करोड़) के फास्टनर इंपोर्ट (Import) करता है, जो मुख्य रूप से चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसे देशों से आते हैं। इनमें से कई इंपोर्ट हाई-प्रेसिजन (High-Precision) या टेक्नोलॉजी-इंटेंसिव (Technology-Intensive) पार्ट्स के होते हैं, जो एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग (Advanced Manufacturing) के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। GTRI के फाउंडर Ajay Srivastava ने इस ओर इशारा किया कि भले ही फास्टनर फाइनल प्रोडक्ट की कुल लागत का 1% से भी कम हिस्सा रखते हों, लेकिन इनकी जरा सी अनुपलब्धता पूरी प्रोडक्शन लाइनों को रोक सकती है। उन्होंने कहा कि ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो मैन्युफैक्चरिंग की कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) बनाए रखने के लिए निर्बाध ट्रेड (Seamless Trade) को सुनिश्चित करें।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.