भारत में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तेजी के चलते फैक्ट्री स्पेस की डिमांड बढ़ रही है। साल **2030** तक सालाना लीजिंग बढ़कर **32 मिलियन वर्ग फीट** होने का अनुमान है, जो **2025** में **21.3 मिलियन वर्ग फीट** थी।
भारत के मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के सपने को अब जमीन पर हकीकत में बदलते देखा जा सकता है। सप्लाई चेन लोकलाइजेशन और कैपेसिटी विस्तार के चलते इंडस्ट्रियल स्पेस की मांग में जबरदस्त उछाल आया है।
निवेश का बढ़ता दौर
इस सेक्टर में केवल ट्रेडिशनल मैन्युफैक्चरिंग ही नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और ईवी (EV) जैसे हाई-टेक सेक्टर बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। इसका असर निवेश पर भी दिख रहा है। साल 2026 की पहली छमाही में वेयरहाउसिंग और इंडस्ट्रियल रियल एस्टेट में इंस्टीट्यूशनल निवेश पिछले साल के मुकाबले 53% बढ़ गया है।
अगर हम पिछले 5 सालों (2020-2025) के डेटा को देखें, तो ऑटोमोटिव और ऑटो कंपोनेंट्स सेक्टर का कुल लीजिंग में 29% हिस्सा रहा है, जबकि इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स ने 18% योगदान दिया है। साथ ही, कंपनियों का ध्यान अब बड़ी और आधुनिक फैसिलिटी पर है, जिससे औसत लीज साइज 71,000 वर्ग फीट (2022) से बढ़कर 94,000 वर्ग फीट (2025) हो गया है।
प्रमुख हब और चुनौतियां
फिलहाल पुणे, चेन्नई और बेंगलुरु इंडस्ट्रियल लीजिंग में सबसे आगे हैं। हालांकि, एनसीआर (NCR), होसुर और अहमदाबाद जैसे नए हब भी तेजी से उभर रहे हैं। भारत के पास 2,50,000 एकड़ से ज्यादा की जमीन तैयार है, जो भविष्य की जरूरतों के लिए एक बड़ा बफर है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
हालाँकि तस्वीर सकारात्मक दिख रही है, लेकिन निवेशकों को 'ओवरसप्लाई' के रिस्क को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर नए इंडस्ट्रियल पार्क के लॉन्च की रफ्तार ऑक्यूपेंसी (Occupancy) से ज्यादा रहती है, तो रेंटल यील्ड और वैल्युएशन पर दबाव आ सकता है। साथ ही, ग्लोबल जियोपॉलिटिकल तनाव और डेवलपर्स पर बढ़ता कर्ज भी एक बड़ा फैक्टर है जिस पर निवेशकों को बारीक नजर रखनी होगी।
