नेशनल हाईवे निर्माण की डेडलाइन 6 साल हुई: क्या होंगे इसके फायदे और नुकसान?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
नेशनल हाईवे निर्माण की डेडलाइन 6 साल हुई: क्या होंगे इसके फायदे और नुकसान?
Overview

भारत के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने नेशनल हाईवे के निर्माण के लिए अधिकतम समय-सीमा को **6 साल** तक बढ़ा दिया है। यह नया नियम **6 मई 2026** से शुरू होने वाले प्रोजेक्ट्स पर लागू होगा, जिसका मकसद प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन (project execution) को बेहतर बनाना और विवादों को कम करना है।

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सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) की ओर से जारी नए दिशानिर्देशों के अनुसार, नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट्स के कंस्ट्रक्शन की समय-सीमा को बढ़ाकर अधिकतम 6 साल कर दिया गया है। यह बदलाव 6 मई 2026 से टेंडर होने वाले प्रोजेक्ट्स पर लागू होगा।

पहले कुछ खास प्रोजेक्ट्स के लिए 30 महीने की कैप (cap) थी, जिसे अब बदला गया है। मंत्रालय का कहना है कि मौजूदा प्रोजेक्ट्स में जटिल भूभाग (complex terrain), बड़े पुलों (major bridges) और अन्य संरचनात्मक जटिलताओं (structural complexities) को देखते हुए पुरानी समय-सीमाएं अव्यावहारिक (unrealistic) थीं। इन अव्यावहारिक समय-सीमाओं के कारण अक्सर प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ रही थी, जोखिम (risks) बढ़ रहे थे, आर्बिट्रेशन (arbitration) के मामले तेज़ी से बढ़ रहे थे और हितधारकों (stakeholders) का भरोसा कम हो रहा था।

नए सर्कुलर के तहत, ₹1,500 करोड़ से ज़्यादा सिविल लागत वाले प्रोजेक्ट्स के लिए 30 महीने की बेस कंस्ट्रक्शन अवधि दी जाएगी। इसके अलावा, प्रोजेक्ट की जटिलता के आधार पर अतिरिक्त समय भी मिलेगा। जैसे, कई फ्लाईओवर (flyovers), टनल (tunnels) या एलिवेटेड स्ट्रक्चर्स (elevated structures) वाले प्रोजेक्ट्स के लिए 6 महीने ज़्यादा मिल सकते हैं। मुश्किल भूभाग, जैसे कटिंग और स्लोप स्टेबिलाइजेशन, के लिए 12 महीने तक का अतिरिक्त समय दिया जा सकता है। 10 किलोमीटर तक के लंबे पुलों के लिए अधिकतम 72 महीने की समय-सीमा होगी। टनल प्रोजेक्ट्स के लिए भी समय बढ़ाया गया है; शुरुआती 2 किलोमीटर के बाद हर किलोमीटर के लिए 6 महीने अतिरिक्त मिलेंगे। पश्चिमी घाट (Western Ghats) के लिए पहले 2 किलोमीटर पर 24 महीने और हिमालय (Himalayas) के लिए 36 महीने का विशेष प्रावधान किया गया है।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारत अपने इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट एजेंडे को तेज़ी से आगे बढ़ा रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए सड़क परिवहन और राजमार्ग क्षेत्र को ₹2.94 लाख करोड़ का भारी-भरकम आवंटन किया गया है। पिछले दस सालों में MoRTH का कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) लगभग 6 गुना बढ़ा है। National Highways Authority of India (NHAI) ने FY26 में ₹2.44 लाख करोड़ का कैपिटल एक्सपेंडिचर किया और 5,313 किलोमीटर हाईवे का निर्माण किया।

हालांकि, यह नई नीति प्रोजेक्ट्स की देरी के मूल कारणों, जैसे कि ज़मीन अधिग्रहण (land acquisition), रेगुलेटरी अप्रूवल (regulatory approvals) और फंडिंग की कमी (funding shortfalls) को पूरी तरह से संबोधित नहीं करती है। लंबी प्रोजेक्ट अवधि (longer project durations) से कंस्ट्रक्शन कंपनियों का पैसा लंबे समय तक फंसा रह सकता है, जिससे उनके कैश फ्लो (cash flow) पर असर पड़ सकता है और महंगाई का जोखिम बढ़ सकता है। भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में लागत बढ़ना (cost overruns) एक आम बात रही है। मई 2024 तक 558 प्रोजेक्ट्स अपने बजट से ₹5.71 लाख करोड़ ज़्यादा महंगे हो चुके थे। वहीं, सितंबर 2024 तक 55% हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (HAM) प्रोजेक्ट्स 6 महीने से ज़्यादा लेट थे।

इसके बावजूद, सरकार का मानना है कि ये नए नियम प्रोजेक्ट्स को पूरा करने में ज़्यादा पूर्वानुमान (predictability) लाएंगे, विवादों को कम करेंगे और राष्ट्रीय राजमार्गों की गुणवत्ता (quality) को बेहतर बनाएंगे। बेहतर और व्यावहारिक बिड्स (bids) से प्रोजेक्ट्स के नतीजे सुधरने और निवेशकों का भरोसा बढ़ने की उम्मीद है। कुल मिलाकर, यह नई नीति मौजूदा सिस्टम की चुनौतियों को स्वीकार करती है, लेकिन क्या यह प्रोजेक्ट डिलीवरी को तेज़ कर पाएगी, यह देखना बाकी है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.