LPG नियमों में बड़ी ढील: भारत की 'क्लीन एनर्जी' राह में अड़चनें, कुछ उद्योगों को मिली राहत

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
LPG नियमों में बड़ी ढील: भारत की 'क्लीन एनर्जी' राह में अड़चनें, कुछ उद्योगों को मिली राहत
Overview

भारत सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए कुछ प्रमुख उद्योगों को लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) का इस्तेमाल जारी रखने की इजाज़त दे दी है। यह कदम देश के 'क्लीन एनर्जी' ट्रांज़िशन (ऊर्जा बदलाव) में आ रही मुश्किलों को दिखाता है, जहाँ सभी सेक्टरों के लिए तुरंत प्राकृतिक गैस (Natural Gas) पर स्विच करना संभव नहीं है।

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पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (Ministry of Petroleum & Natural Gas) ने साफ कर दिया है कि फार्मा, फूड प्रोसेसिंग, एल्युमीनियम, स्टील, सीमेंट जैसे कई अहम उद्योग, जहाँ तकनीकी या लागत की वजह से प्राकृतिक गैस पर जाना मुश्किल है, वे मार्च 2026 तक अपनी औसत दैनिक LPG खपत का 70% तक इस्तेमाल कर सकेंगे। कुल मिलाकर, इन सेक्टरों के लिए यह सीमा 200 टन प्रति दिन तय की गई है। इससे इन उद्योगों को पाइप वाली नेचुरल गैस (PNG) के लिए अनिवार्य आवेदन से छूट मिल गई है, जिससे उनका काम बिना रुकावट चलता रहेगा।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सरकार दूसरे सेक्टर्स में नेचुरल गैस की सप्लाई बढ़ा रही है। पिछले हफ्ते ही, उर्वरक (Fertilizer) बनाने वाली कंपनियों के लिए नेचुरल गैस का आवंटन उनकी औसत खपत का 90% तक किया गया था, जबकि दूसरे इंडस्ट्रियल यूज़र्स और चाय कंपनियों के लिए यह 80% तक बढ़ाया गया है।

यह छूट इस बात का संकेत है कि भारत के 'क्लीन एनर्जी' लक्ष्यों को हासिल करना आसान नहीं है। नेचुरल गैस को एक क्लीन फ्यूल माना जाता है, लेकिन कई उद्योगों के लिए इसका इस्तेमाल शुरू करना कई वजहों से अटका हुआ है। इनमें पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और कुछ मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाओं की खास ज़रूरतें शामिल हैं। ग्लोबल एनर्जी मार्केट की अस्थिरता, खासकर मिडिल ईस्ट से सप्लाई के अनिश्चित होने और प्रमुख शिपिंग रूट्स पर तनाव, भी एक बड़ी चुनौती है। यह पॉलिसी फिलहाल इन ज़रूरी उद्योगों को सहारा देगी, लेकिन इसका मतलब है कि ये क्षेत्र LPG का इस्तेमाल ज़्यादा समय तक जारी रखेंगे, जो घरों और दूसरे व्यवसायों में नेचुरल गैस को बढ़ावा देने के सरकारी इरादों से थोड़ा अलग है।

LPG का इस्तेमाल जारी रखने में कई जोखिम भी हैं। इन उद्योगों को ग्लोबल सप्लाई शॉक (Supply Shocks) का खतरा बढ़ जाता है, खासकर मिडिल ईस्ट में किसी भी तनाव की स्थिति में। यह 'ग्रीन गोल्स' (Green Goals) को भी धीमा कर सकता है, क्योंकि यह क्लीनर विकल्पों में निवेश को टाल सकता है। साथ ही, जिन उद्योगों ने नेचुरल गैस या रिन्यूएबल एनर्जी अपना ली है, उन्हें लागत के मामले में फायदा मिल सकता है, जबकि LPG पर निर्भर रहने वाले पीछे छूट सकते हैं। भारत अब भी LPG का बड़ा इम्पोर्टर है, खासकर मिडिल ईस्ट से, और ग्लोबल कीमतों में बढ़ोतरी देश के ट्रेड बैलेंस पर दबाव डाल सकती है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि नेचुरल गैस एनर्जी ट्रांज़िशन का एक अहम हिस्सा है, जो रिन्यूएबल एनर्जी को शामिल करने और कोयले पर निर्भर सेक्टर्स को साफ करने में मदद कर सकती है। हालांकि, इंपोर्टेड LNG की ऊंची कीमतें और पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने की ज़रूरत जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। भारत अपनी ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने और घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने का लक्ष्य रख रहा है। देश की लंबी अवधि की ऊर्जा रणनीति तेजी से पाइपलाइन डेवलपमेंट और क्लीनर फ्यूल्स के उचित वितरण पर निर्भर करेगी, ताकि मौजूदा औद्योगिक मांगों और महत्वाकांक्षी पर्यावरणीय लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाया जा सके।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.