सरकार ने नेशनल स्टील पॉलिसी 2047 का ड्राफ्ट जारी कर दिया है, जिसमें स्टील प्रोडक्शन क्षमता को **604 मिलियन टन** तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। यह पॉलिसी न केवल कैपेसिटी विस्तार बल्कि कार्बन उत्सर्जन कम करने और हाई-वैल्यू स्टील प्रोडक्ट्स पर जोर देती है, जो भविष्य में स्टील कंपनियों के फाइनेंशियल और ऑपरेशनल मॉडल को बदल सकता है।
भारी निवेश और फाइनेंशियल चुनौतियां
604 मिलियन टन की क्षमता हासिल करने के लिए स्टील कंपनियों को लंबे समय तक भारी कैपिटल स्पेंडिंग करनी होगी। इतिहास गवाह है कि स्टील सेक्टर में ऐसे बड़े विस्तार अक्सर कंपनी के डेट लेवल को बढ़ाते हैं। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां अपनी बैलेंस शीट को कैसे मैनेज करती हैं। अच्छी बात यह है कि पॉलिसी में 'स्पेशलिटी स्टील' पर जोर दिया गया है, जिसका मार्जिन सामान्य कमोडिटी स्टील से बेहतर होता है।
'ग्रीन स्टील' का बड़ा चैलेंज
पॉलिसी का एक अहम हिस्सा कार्बन एमिशन को कम करना है। इसे मौजूदा 2.54 टन से घटाकर 1.54 टन (प्रति टन क्रूड स्टील) तक लाने का लक्ष्य है। ग्लोबल मार्केट में CBAM जैसे ट्रेड बैरियर्स को देखते हुए यह कदम एक फाइनेंशियल जरूरत बन गया है। जो कंपनियां समय रहते 'ग्रीन टेक्नोलॉजी' अपनाएंगी, उन्हें एक्सपोर्ट मार्केट में बड़ा कॉम्पिटिटिव फायदा मिल सकता है।
MSMEs और छोटे खिलाड़ियों की भूमिका
सरकार का विजन केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं है। इसमें सेकेंडरी स्टील मेकर्स और MSMEs को भी शामिल किया गया है। रॉ मटेरियल की सिक्योरिटी और डेडिकेटेड मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर्स के जरिए सरकार सेक्टर में संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
निवेशकों के लिए अहम बातें
2047 का लक्ष्य एक लॉन्ग-टर्म रोडमैप है, लेकिन निवेशकों को फिलहाल प्रोजेक्ट्स के एग्जीक्यूशन, रॉ मटेरियल की उपलब्धता और कंपनियों के डेट मैनेजमेंट पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए।
