भारत के रक्षा उत्पादन (Defence Production) ने वित्त वर्ष 2026 (FY26) में ₹1.78 लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है। यह इस क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है, जिसमें प्राइवेट कंपनियों की हिस्सेदारी रिकॉर्ड **23.6%** तक पहुंच गई है। सरकारी नीतियों और बढ़ते एक्सपोर्ट के दम पर यह ग्रोथ आई है, और अब प्राइवेट प्लेयर सिर्फ कंपोनेंट सप्लाई से आगे बढ़कर बड़े डिफेंस सिस्टम इंटीग्रेटर बन रहे हैं।
रक्षा उत्पादन ने पकड़ी रफ्तार
भारत के रक्षा विनिर्माण (Defence Manufacturing) क्षेत्र ने वित्त वर्ष 2026 में कुल ₹1,78,000 करोड़ का उत्पादन दर्ज किया है। यह पिछले साल के ₹1,54,100 करोड़ के मुकाबले 15.6% की सालाना ग्रोथ दिखाता है। पिछले एक दशक में इस सेक्टर में जबरदस्त तेजी आई है, जहां 2017 में यह आंकड़ा सिर्फ ₹74,100 करोड़ था।
प्राइवेट सेक्टर की बढ़ी भागीदारी
इस ग्रोथ में एक खास बात प्राइवेट कंपनियों की बढ़ती हिस्सेदारी है। वित्त वर्ष 2026 में, प्राइवेट कंपनियों ने लगभग ₹42,000 करोड़ का योगदान दिया, जो कुल रक्षा उत्पादन का 23.6% है। 2017 में यह हिस्सेदारी केवल 19% थी। सरकारी नीतियों में बदलाव, नई खरीद नियमों और लोकल कंटेंट (Local Content) को बढ़ावा देने के कारण प्राइवेट कंपनियां अब सिर्फ कंपोनेंट बनाने वाली नहीं, बल्कि बड़े डिफेंस प्लेटफॉर्म्स के लिए लीड सिस्टम इंटीग्रेटर (Lead System Integrator) के तौर पर उभर रही हैं।
एक्सपोर्ट में भी बड़ी छलांग
रक्षा एक्सपोर्ट (Defence Exports) भी इस सेक्टर के लिए एक बड़ा सहारा बना है। वित्त वर्ष 2026 में यह ₹38,400 करोड़ तक पहुंच गया, जो 2017 के केवल ₹1,500 करोड़ से काफी ज्यादा है। अब कुल एक्सपोर्ट का लगभग आधा हिस्सा प्राइवेट कंपनियां ही कर रही हैं, जो उनकी अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता और लागत मानकों को पूरा करने की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है।
नए ऑर्डर्स और भविष्य की राह
रक्षा मंत्रालय ने जुलाई 2026 की शुरुआत में ₹52,000 करोड़ के नए अधिग्रहण प्रस्तावों (Acquisition Proposals) को मंजूरी दी है। इन प्रोजेक्ट्स में एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वाले रक्षा उत्पाद शामिल हैं, जैसे कि एंटी-यूएवी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, एयर डिफेंस मिसाइलें और विभिन्न तरह के अनमैन्ड प्लेटफॉर्म।
निवेशकों के लिए, एडवांस्ड डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स, मिसाइल और कंज्यूमेबल्स (Consumables) जैसे क्षेत्रों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। हालांकि, इस सेक्टर को लगातार सरकारी नीतियों और ऑर्डरों का फायदा मिल रहा है, लेकिन कंपनियों की असली परीक्षा प्रोजेक्ट को समय पर पूरा करने और बड़े कॉन्ट्रैक्ट्स में मार्जिन बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगी। जिन कंपनियों का डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन (Domestic Value Addition) ज्यादा है, वे खरीद नियमों और एक्सपोर्ट के बदलते माहौल में बेहतर स्थिति में होंगी। अब देखना यह होगा कि ये नए प्रस्ताव कितनी जल्दी प्लानिंग से असल ऑर्डर और फिर प्रोडक्शन तक पहुंचते हैं।
