Shipbuilding Industry: भारत और दक्षिण कोरिया की नई साझेदारी, मरीन इक्विपमेंट के लिए खुलेंगे नए रास्ते

INDUSTRIAL-GOODSSERVICES
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Shipbuilding Industry: भारत और दक्षिण कोरिया की नई साझेदारी, मरीन इक्विपमेंट के लिए खुलेंगे नए रास्ते

केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल अब दक्षिण कोरिया की समुद्री उपकरण कंपनियों को भारत में मैन्युफैक्चरिंग शुरू करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। **$7.8 बिलियन** के सरकारी सपोर्ट पैकेज के बाद **2026** में देश का शिपबिल्डिंग आउटपुट **80%** बढ़ा है और अब फोकस तकनीक के स्वदेशीकरण पर है।

केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने दक्षिण कोरिया की मरीन इक्विपमेंट कंपनियों को भारत में अपना आधार बनाने के लिए आमंत्रित किया है। इस पहल के तहत, 'कोरिया मरीन इक्विपमेंट एसोसिएशन' अक्टूबर में मुंबई में अपना नया कार्यालय खोलने जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य जहाज के इंजन, डेक मशीनरी और नेविगेशन सिस्टम जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स का भारत में ही निर्माण करना है, जो फिलहाल विदेश से आयात किए जाते हैं।

शिपिंग सेक्टर में तेजी

यह कदम भारतीय शिपबिल्डिंग सेक्टर के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। 2025 के अंत में घोषित $7.8 बिलियन के सरकारी निवेश पैकेज की बदौलत 2026 में घरेलू उत्पादन में 80% की शानदार बढ़त देखी गई है। फिलहाल, भारतीय इंडस्ट्री के पास $23 बिलियन से ज्यादा की ऑर्डर बुक है, जिसके तहत अगले दशक में 400 से अधिक जहाजों का निर्माण किया जाना है।

भारतीय शिपयार्ड्स के लिए फायदे

लोकल मैन्युफैक्चरिंग बढ़ने से भारतीय शिपयार्ड्स की ऑपरेशनल एफिशिएंसी में बड़ा सुधार आएगा। वर्तमान में भारी आयात के कारण लॉजिस्टिकल लागत और जटिलताएं बनी रहती हैं। 'VOYAGES' सहयोग ढांचे के जरिए तकनीक का हस्तांतरण करके सरकार स्थानीय कंपनियों को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना चाहती है, जिससे लॉन्ग टर्म में प्रोक्योरमेंट कॉस्ट कम होगी और मुनाफा बढ़ेगा।

चुनौतियां और जोखिम

निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि एडवांस्ड मैरीटाइम इंजीनियरिंग एक जटिल और लंबी प्रक्रिया है। जॉइंट वेंचर्स की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि तकनीक का हस्तांतरण कितनी प्रभावी ढंग से होता है और कंपनियां अंतरराष्ट्रीय मानकों को कैसे बनाए रखती हैं। निवेशकों को कच्चे माल की कीमतों के ट्रेंड और ग्लोबल डिमांड पर भी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ये फैक्टर्स सीधे तौर पर सेक्टर की प्रॉफिटेबिलिटी को प्रभावित करते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.