मांग पर महंगाई का असर
ICRA की लेटेस्ट रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले दो फाइनेंशियल ईयर में भारत में कॉपर की खपत की ग्रोथ 10-12% सालाना रह सकती है। यह पिछले फाइनेंशियल ईयर 2026 के पहले सात महीनों में देखी गई 14-15% की दमदार ग्रोथ से कम है। इस नरमी की मुख्य वजह ग्लोबल कॉपर की कीमतों में आई भारी तेजी है। जनवरी 2026 तक ग्लोबल कीमतें करीब USD 13,000 प्रति टन तक पहुँच गई थीं, जो फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत से लगभग 40% ज्यादा है।
हालांकि, शहरीकरण, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन जैसे मजबूत फैक्टर्स डिमांड को सपोर्ट कर रहे हैं। खासकर रिन्यूएबल एनर्जी, पावर ग्रिड, डेटा सेंटर्स और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) जैसे सेक्टर्स से कॉपर की मांग मध्यम अवधि में मजबूत बनी रहेगी।
वैल्यू चेन में मुनाफाखोरी का बटवारा
बढ़ती कीमतों का असर कॉपर वैल्यू चेन पर अलग-अलग दिख रहा है। अपस्ट्रीम यानी माइनिंग और शुरुआती प्रोसेसिंग करने वाली कंपनियां बढ़ी कीमतों और ऐतिहासिक रूप से कम ट्रीटमेंट और रिफाइनिंग चार्जेज (TC/RCs) के चलते काफी फायदे में हैं। इन कम चार्जेज की वजह से माइनर्स को कीमत का बड़ा हिस्सा मिल रहा है, जिससे उनका मुनाफा मल्टी-ईयर हाई पर पहुँच गया है। वहीं, डाउनस्ट्रीम स्मेल्टिंग और रिफाइनिंग करने वाली कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है, क्योंकि TC/RCs में भारी गिरावट आई है।
ग्लोबल सप्लाई की कमी और कीमतों का आउटलुक
ग्लोबल मार्केट में सप्लाई की कमी बनी हुई है, जो कीमतों को ऊंचा रखे हुए है। माइनिंग ऑपरेशन्स में आई रुकावटें, अयस्क की घटती गुणवत्ता (declining ore grades) और भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं (जैसे US टैरिफ की आशंकाएं) कीमतों को बढ़ा रही हैं। J.P. Morgan ग्लोबल रिसर्च का अनुमान है कि 2026 में कॉपर का अनुमानित रिफाइंड डेफिसिट करीब 330,000 मीट्रिक टन रहेगा।
ग्लोबल कॉपर प्राइसेस में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया है, जो जनवरी 2026 में $13,300 प्रति मीट्रिक टन के ऑल-टाइम हाई को पार कर गया था। ICRA का अनुमान है कि फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली छमाही (H1 FY27) में कीमतें $11,000–$12,000 प्रति टन के बीच रह सकती हैं। J.P. Morgan ने 2026 के लिए औसतन ~$12,075 प्रति टन का अनुमान लगाया है। फिलहाल 6 फरवरी 2026 को कॉपर की कीमत $5.85 USD प्रति पाउंड पर है, जो पिछले साल से 27.55% ज्यादा है।
कुल मिलाकर, भारत में कॉपर की डिमांड के आउटलुक पर मौजूदा हाई-प्राइसेस का असर दिख रहा है, लेकिन लॉन्ग-टर्म ग्रोथ के लिए एनर्जी ट्रांजिशन और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे फैक्टर महत्वपूर्ण बने रहेंगे।