एनर्जी सप्लाई पर मंडराता खतरा और भारत का जवाब
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक अस्थिरता लगातार बढ़ रही है, जो भारत की एनर्जी सप्लाई के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर रही है। भारत अपने LPG इंपोर्ट का करीब 90% हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों से करता है। हालिया क्षेत्रीय संघर्षों ने ऊर्जा मार्गों को बाधित किया है, जिसके कारण फरवरी से अप्रैल 2026 के बीच भारत के कच्चे तेल के इंपोर्ट में 21% की गिरावट भी देखी गई। इसी खतरे को भांपते हुए, भारत सरकार ₹12,500 करोड़ के भारी निवेश से नौ LPG पाइपलाइन प्रोजेक्ट्स शुरू कर रही है, जिनकी कुल लंबाई लगभग 2,500 किलोमीटर होगी। इस कदम से भारत घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करेगा और संभावित समुद्री नाकाबंदी या कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के जोखिम को कम करेगा।
इंफ्रास्ट्रक्चर को बड़ा बूस्ट, भविष्य की तैयारी
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड (PNGRB) इन चार मुख्य पाइपलाइनों के लिए बोलियां मंगवाने की प्रक्रिया तेज कर रहा है: चेरलापल्ली-नागपुर, शिकारपुर-हुबली-गोवा, पारादीप-रायपुर, और झांसी-सीतापुर। यह भारत के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य 2030 तक ₹143 लाख करोड़ का खर्च करना है, जिसमें पीएम गति शक्ति (PM Gati Shakti) जैसे लॉजिस्टिक्स प्लानिंग प्रोग्राम भी शामिल हैं। इससे पहले भारत 2,800 किलोमीटर लंबी कांडला-गोरखपुर LPG लाइन जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स पूरे कर चुका है, जिसकी लागत $1.3 बिलियन थी। यह नई योजना रिफाइनरियों और इंपोर्ट टर्मिनलों को सीधे बॉटलिंग प्लांट से जोड़ेगी, जिससे फिलहाल LPG की बड़ी मात्रा ढोने वाले रोड टैंकरों पर निर्भरता कम होगी।
सुविधा, सुरक्षा और पर्यावरण को फायदे
LPG की ढुलाई रोड टैंकरों से पाइपलाइनों में शिफ्ट होने से कई फायदे होंगे। सबसे पहले, यह सुरक्षा बढ़ाएगा क्योंकि सड़क परिवहन में होने वाले हादसों का खतरा कम होगा। दूसरा, इससे ट्रांसपोर्टेशन का समय कम होगा और प्रोडक्ट लॉस भी घटेगा, जिससे सप्लाई सस्ती और ज्यादा भरोसेमंद बनेगी। पर्यावरण के लिहाज़ से, टैंकरों की जगह पाइपलाइन का इस्तेमाल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को काफी कम करेगा, जो भारत के जलवायु लक्ष्यों और 2070 तक नेट-ज़ीरो (Net-Zero) के वादे को पूरा करने में मदद करेगा। ये पाइपलाइनें आपातकाल के समय सप्लाई को और मजबूत करेंगी।
चुनौतियां और आगे की राह
बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में हमेशा ज़मीन अधिग्रहण और पर्यावरण मंजूरी जैसी मुश्किलें आती हैं। भारत में भी ऐसे प्रोजेक्ट्स में अक्सर देरी और लागत बढ़ने का खतरा रहता है। हालांकि, सरकारी नियमों में सुधार से प्रक्रियाएं तेज हुई हैं, लेकिन राज्यों के बीच अलग-अलग कार्यान्वयन और जटिल नियमों का पालन करना अभी भी एक चुनौती है। इसके अलावा, LPG जैसे आयातित जीवाश्म ईंधनों पर भारत की कुल निर्भरता अभी भी एक आर्थिक कमजोरी बनी हुई है। लेकिन, यह पाइपलाइन प्रोजेक्ट भारत की लंबी अवधि की एनर्जी सिक्योरिटी रणनीति का एक अहम हिस्सा है, जिसका उद्देश्य एक मजबूत, कुशल और सुरक्षित फ्यूल डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम बनाना है।
