भारतीय सीमेंट सेक्टर में इस समय एक ज़बरदस्त कैपेक्स (Capex) रेस चल रही है, जिसमें Adani Group और UltraTech Cement जैसे दिग्गज ₹50,000 करोड़ से ज़्यादा का निवेश करके अपनी क्षमता बढ़ाने की होड़ में हैं। यह सब देश में इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) और हाउसिंग (housing) सेक्टर से बढ़ती मांग को भुनाने के लिए किया जा रहा है।
UltraTech Cement, जो पहले से ही 200 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) से ज़्यादा की क्षमता के साथ मार्केट लीडर है, साल 2028 तक अपनी क्षमता को बढ़ाकर 240.76 MTPA तक ले जाने का लक्ष्य रखती है। इसके लिए कंपनी इंडिया सीमेंट्स (India Cements) और केसोराम इंडस्ट्रीज (Kesoram Industries) के सीमेंट बिज़नेस जैसे हालिया एक्विजिशन (acquisitions) का इस्तेमाल कर रही है।
दूसरी तरफ, Adani Group अपने Ambuja Cements और ACC के ज़रिए तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। Ambuja की योजना 2028 तक अपनी क्षमता को 155 MTPA तक पहुंचाने की है, जिसमें पेन्ना सीमेंट (Penna Cement) और ओरिएंट सीमेंट (Orient Cement) जैसे एक्विजिशन भी शामिल हैं। ACC का Ambuja Cements में प्रस्तावित विलय (merger) एक ज़्यादा पॉवरफुल इंटीग्रेटेड बिज़नेस बनाने की दिशा में एक कदम है।
हालांकि, Ambuja Cements ने हाल ही में अपनी रणनीति में एक अहम बदलाव का संकेत दिया है। कंपनी अब तेज़ी से क्षमता बढ़ाने के बजाय मुनाफे (profitability) को प्राथमिकता दे रही है और अपने मौजूदा एसेट्स को ऑप्टिमाइज़ (optimizing) करने पर ज़ोर दे रही है। इस बदलाव के कारण, कंपनी अपने 2028 के लक्ष्यों को पूरा करने में शायद एक-दो साल की देरी कर सकती है, क्योंकि वे कैपेसिटी यूटिलाइजेशन (utilization) को 80-85% तक सुधारना चाहते हैं। यह दिखाता है कि सिर्फ बड़े पैमाने पर उत्पादन से रिटर्न (returns) नहीं मिलता अगर मार्जिंस (margins) पर दबाव रहे।
सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार खर्च (FY27 के लिए ₹12.2 लाख करोड़ का अनुमान) और हाउसिंग की मज़बूत मांग सीमेंट के लिए एक मज़बूत आधार तैयार कर रही है। कुल मिलाकर, FY28 तक इंडस्ट्री में 160-170 मिलियन टन नई क्षमता जुड़ने की उम्मीद है, जिसमें लगभग 65% ब्राउनफील्ड विस्तार (brownfield expansions) से आएगा।
लेकिन, इस तेज़ी के साथ लागत का दबाव भी बढ़ रहा है। फ्यूल (fuel), पैकेजिंग (packaging) और रॉ मैटेरियल (raw material) जैसी इनपुट कॉस्ट (input costs) भी बढ़ रही हैं। भू-राजनीतिक कारणों (geopolitical factors) से इसमें ₹400-500 प्रति टन तक की बढ़ोतरी का अनुमान है। इस माहौल में, नई क्षमता का इतना बड़ा इनफ्लो (influx) कीमतों पर दबाव डाल सकता है, खासकर अगर मांग उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ी, जिससे प्रॉफिट मार्जिंस (profit margins) पर असर पड़ सकता है।
सेक्टर में वैल्यूएशन (valuation) को लेकर भी बड़ा अंतर दिख रहा है। UltraTech Cement फिलहाल अपने प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले ऊँचे वैल्यूएशन पर ट्रेड कर रहा है। इसका प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेशियो करीब 41-43x है, जबकि Ambuja Cements का P/E 19-26x और ACC का 11-12x है। इसी वजह से हाल ही में कुछ एनालिस्ट्स (analysts) ने UltraTech पर रेटिंग डाउनग्रेड (downgrade) भी की है।
FY26 में ही करीब 70-75 मिलियन टन नई क्षमता बाज़ार में आ सकती है। यदि यह मांग वृद्धि की गति से ज़्यादा हो जाती है, तो कैपेसिटी यूटिलाइजेशन रेट (capacity utilization rates) गिर सकते हैं, जो इंडस्ट्री के औसत 70% से भी नीचे जा सकता है। ऐसे में, कंपनियाँ, खासकर जिनके फिक्स्ड कॉस्ट (fixed costs) या डेट (debt) ज़्यादा हैं, मार्केट शेयर बनाए रखने के लिए प्राइस वॉर (price war) में उतर सकती हैं। Ambuja Cements का मुनाफे पर फोकस इसी बढ़ती प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है।
विश्लेषकों का मानना है कि FY27 तक भारत में सीमेंट की मांग 6-8% की दर से बढ़ेगी। लेकिन बढ़ती इनपुट कॉस्ट और कीमतों में बढ़ोतरी की अनिश्चितता के चलते प्रॉफिट मार्जिन (profit margins) पर नज़दीकी अवधि में दबाव रह सकता है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार, FY27 में वॉल्यूम ग्रोथ 6-7% रह सकती है, लेकिन प्रति टन प्रॉफिटेबिलिटी FY26 के स्तर से कम हो सकती है। इंडस्ट्री का फोकस अब ऑपरेशनल एफिशिएंसी (operational efficiency) और कॉस्ट मैनेजमेंट (cost management) पर ज़्यादा है, जो यह दिखाता है कि बाज़ार अब सिर्फ वॉल्यूम बढ़ाने के बजाय टिकाऊ वित्तीय रिटर्न (sustainable financial returns) को ज़्यादा महत्व दे रहा है।
