भारत का बड़ा दांव: ₹69,725 करोड़ से शिपबिल्डिंग सेक्टर बनेगा आत्मनिर्भर!
Overview
भारत सरकार ने देश के शिपबिल्डिंग और समुद्री क्षेत्र को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। हाल ही में घोषित **₹69,725 करोड़** के इस इनिशिएटिव (Initiative) को राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
सरकार के इस फैसले के पीछे का मुख्य उद्देश्य शिपबिल्डिंग को सिर्फ एक समुद्री गतिविधि से आगे ले जाकर एक 'रणनीतिक औद्योगिक क्षमता' (Strategic Industrial Capability) के रूप में स्थापित करना है। इकोनॉमिक सर्वे में इस बात पर जोर दिया गया है कि यह कदम भारत की आर्थिक आजादी और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह सिर्फ व्यापार को बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) और देश की रणनीतिक योजनाओं को मजबूत करने के लिए उठाया गया एक बड़ा कदम है।
शिपबिल्डिंग पहल के मुख्य स्तंभ
इस व्यापक रणनीति को चार मुख्य स्तंभों पर बनाया गया है, जिनका लक्ष्य एक ग्लोबल स्तर पर प्रतिस्पर्धी, टेक्नोलॉजी-सेवी और टिकाऊ समुद्री इकोसिस्टम तैयार करना है। इसका एक बड़ा हिस्सा 'शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम (SBFAS)' के तहत ₹24,736 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जो 31 मार्च 2036 तक लागू रहेगा। SBFAS का मकसद घरेलू शिपयार्ड्स को अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के मुकाबले लागत में आने वाली दिक्कतों को दूर करना है। इसके साथ ही, ₹4,001 करोड़ का शिप-ब्रेकिंग क्रेडिट नोट (Shipbreaking Credit Note) पर्यावरण के अनुकूल रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देगा, जो ग्रीन शिपिंग (Green Shipping) के बढ़ते नियमों के अनुरूप है।
फाइनेंसिंग और क्षमता विस्तार
लंबे समय से चली आ रही फाइनेंसिंग (Financing) की चुनौतियों से निपटने के लिए, सरकार ने ₹25,000 करोड़ का 'मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड (MDF)' स्थापित किया है। इस फंड में ₹20,000 करोड़ का 'मैरीटाइम इन्वेस्टमेंट फंड' शामिल है, जिसमें सरकार की 49% हिस्सेदारी होगी, और ₹5,000 करोड़ का 'इंटरेस्ट इंसेटिवाइजेशन फंड' (Interest Incentivisation Fund) है, जिसका उद्देश्य उधारी की लागत को कम करना और प्रोजेक्ट्स की व्यवहार्यता को बढ़ाना है। इस ढांचे का लक्ष्य कैपिटल-इंटेंसिव इंडस्ट्री में निजी पूंजी को आकर्षित करना है, जहाँ प्रोजेक्ट की समय-सीमा लंबी होती है। इसके अलावा, 'शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम (SbDS)' के तहत ₹19,989 करोड़ की राशि से सालाना 4.5 मिलियन ग्रॉस टनेज (Gross Tonnage) की शिपबिल्डिंग क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। यह बड़े शिपबिल्डिंग क्लस्टर्स के विकास और मौजूदा सुविधाओं के आधुनिकीकरण में मदद करेगा।
टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर का तालमेल
इस योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 'इंडिया शिप टेक्नोलॉजी सेंटर' की स्थापना है। इस सेंटर का विजन शिपबिल्डिंग डिजाइन, एडवांस्ड रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D), मैनपावर ट्रेनिंग और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के समन्वय में घरेलू विशेषज्ञता को बढ़ावा देना है। इसी के साथ, सितंबर 2025 में बड़े जहाजों को 'इंफ्रास्ट्रक्चर हार्मोनाइज्ड मास्टर लिस्ट' में शामिल किया गया। इस रणनीतिक कदम से योग्य शिपबिल्डिंग प्रोजेक्ट्स को लॉन्ग-टर्म इंफ्रास्ट्रक्चर-लिंक्ड फाइनेंसिंग (Long-term Infrastructure-linked Financing) तक पहुंच आसान हो जाएगी, जिससे उनकी वित्तीय व्यवहार्यता और विकास की संभावनाओं को और बल मिलेगा। वैश्विक शिपबिल्डिंग बाजार पर कुछ बड़े खिलाड़ियों का दबदबा है, और भारत के इस हस्तक्षेप का लक्ष्य एक अधिक विविध और सक्षम घरेलू उद्योग का निर्माण करना है।