Kaiga Nuclear Expansion: भारत की 'फ्लीट मोड' रणनीति का आगाज़, बिजली का 'महायुग' शुरू?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Kaiga Nuclear Expansion: भारत की 'फ्लीट मोड' रणनीति का आगाज़, बिजली का 'महायुग' शुरू?
Overview

सरकारी कंपनी न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) ने कर्नाटक के कैगा में दो **700 MW** के प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर्स (PHWRs) - कैगा 5 और 6 - के निर्माण का काम शुरू कर दिया है। यह भारत की 'फ्लीट मोड' रणनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद न्यूक्लियर क्षमता को तेजी से बढ़ाना, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मज़बूत करना और देश की ऊर्जा सुरक्षा को सुरक्षित करना है।

'फ्लीट मोड' - न्यूक्लियर पावर में भारत का नया मंत्र

कैगा परमाणु ऊर्जा संयंत्र में निर्माण शुरू होना, भारत की महत्वाकांक्षी परमाणु ऊर्जा विस्तार योजना में एक महत्वपूर्ण कदम है। अब भारत अलग-अलग प्रोजेक्ट्स पर ध्यान देने के बजाय, एक स्टैंडर्डाइज्ड और इंडस्ट्रियलाइज्ड तरीके से परमाणु संयंत्रों का निर्माण करेगा। इस 'फ्लीट मोड' के तहत 700 MW क्षमता के PHWRs को तेजी से स्थापित किया जाएगा, जिससे प्रोजेक्ट्स को पूरा करने में लगने वाला समय कम होगा, लागत घटेगी और देश के क्लीन एनर्जी भविष्य को मजबूती मिलेगी।

टारगेट तय, तेज़ी से बढ़ेगी क्षमता

NPCIL ने कैगा यूनिट 5 और 6 पर काम शुरू कर दिया है, जो 700 MW के PHWRs होंगे। यह भारत की स्टैंडर्डाइज्ड 'फ्लीट मोड' कंस्ट्रक्शन स्ट्रेटेजी का एक बड़ा उदाहरण है, जिसे तेज़ी से न्यूक्लियर क्षमता बढ़ाने के लिए बनाया गया है। भारत का लक्ष्य 2032 तक 22.5 GW और 2047 तक 100 GW न्यूक्लियर पावर जेनरेशन का है। 'फ्लीट मोड' के तहत 2017 में ही दस 700 MW PHWR यूनिट्स को मंजूरी मिली थी, जिसका मकसद बड़े पैमाने पर उत्पादन और दक्षता को अधिकतम करना है। यह स्ट्रेटेजी स्वदेशी रिएक्टर डिजाइनों का उपयोग करती है और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उन्नत सुरक्षा सुविधाएँ शामिल करती है। प्रोजेक्ट का आधिकारिक शुभारंभ 24 फरवरी, 2026 को हुआ, और उम्मीद है कि पहली यूनिट लगभग 60 महीनों के भीतर क्रिटिकैलिटी (criticality) तक पहुँच जाएगी।

'मेक इन इंडिया' को बढ़ावा और आत्मनिर्भरता

'फ्लीट मोड' पहल, दुनिया भर में और भारत में भी पहले देखी गई धीमी और अक्सर अटकी रहने वाली कंस्ट्रक्शन साइकिल से एक बड़ा बदलाव है। जहाँ दुनिया भर में परमाणु रिएक्टरों के निर्माण में औसतन छह से आठ साल लगते हैं, वहीं भारत का स्टैंडर्डाइज्ड तरीका पहले कंक्रीट डालने के बाद से लगभग पांच साल का लक्ष्य रखता है। यह स्ट्रेटेजी सीधे तौर पर भारत की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को विकसित करने और महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स तथा इंजीनियरिंग सेवाओं के लिए एक मजबूत सप्लाई चेन बनाने से जुड़ी है। BHEL और Megha Engineering & Infrastructure Ltd (MEIL) जैसी कंपनियां इन बड़े ऑर्डर्स से लाभान्वित होंगी, जो 'मेक इन इंडिया' पहल को और मज़बूत करेगा। यह औद्योगिक विस्तार तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब भारत अपनी परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता को काफी बढ़ाना चाहता है, जो वर्तमान में देश की कुल बिजली का लगभग 3% है।

चुनौतियाँ और जोखिम

'फ्लीट मोड' के फायदों के बावजूद, भारत की परमाणु ऊर्जा योजनाओं के सामने कुछ चुनौतियाँ भी हैं। भारत में बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में ऐतिहासिक रूप से जटिल रेगुलेटरी अप्रूवल, सप्लाई चेन में रुकावटें और ठेकेदार फाइनेंसिंग जैसे मुद्दे रहे हैं, जिनके कारण देरी हुई है। इसके अलावा, परमाणु देनदारी (nuclear liability) से जुड़ा भारत का कानूनी ढांचा, विशेष रूप से 'सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट', अंतर्राष्ट्रीय सप्लायर्स के लिए मुश्किलें पैदा करता रहा है। ईंधन की सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है; भारत यूरेनियम के आयात पर निर्भर है, जिससे इसकी सप्लाई चेन भू-राजनीतिक अस्थिरता के प्रति संवेदनशील हो जाती है। इन सबके बीच, NPCIL का सुरक्षा रिकॉर्ड अच्छा है, लेकिन अतीत की कुछ घटनाएं (जैसे कैगा में 1994 की घटना) कड़ी निगरानी के महत्व को दर्शाती है।

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