ऊर्जा सुरक्षा की ओर बड़ा कदम
केंद्र सरकार ने कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण (Coal Gasification) प्रोजेक्ट्स के लिए ₹37,500 करोड़ के इंसेंटिव (incentive) की मंजूरी दी है। इस स्कीम का मकसद घरेलू कोयले के विशाल भंडार का फायदा उठाना और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है। योजना के तहत, सालाना करीब 75 मिलियन टन कोयले को सिनगैस (syngas) में बदला जाएगा। सिनगैस एक ऐसी गैस है जिसे कोयले से बनाया जाता है और इसका इस्तेमाल फ्यूल (fuel) और केमिकल्स (chemicals) बनाने में होता है। सरकार का लक्ष्य है कि इस योजना से ₹2.5 से ₹3 लाख करोड़ का डाउनस्ट्रीम इन्वेस्टमेंट (downstream investment) आए। साथ ही, 2030 तक 100 मिलियन टन कोयला गैसीकरण क्षमता हासिल करने का राष्ट्रीय लक्ष्य भी इससे मजबूत होगा।
आयात पर निर्भरता घटाने की कोशिश
वैश्विक स्तर पर बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता (geopolitical tensions) के बीच, भारत एलएनजी (LNG), मेथनॉल (methanol) और अमोनिया (ammonia) जैसे जरूरी सामानों के आयात पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहता है। भारत के पास कोयले का विशाल भंडार है, जिसका अनुमान 401 बिलियन टन है। यह भंडार करीब 200 सालों तक चल सकता है और फिलहाल यह देश की ऊर्जा का 55% से अधिक हिस्सा है।
घरेलू संसाधनों का उपयोग
हालांकि दुनिया भर में कोयले को फेज-आउट (phase-out) करने पर जोर दिया जा रहा है, भारत अपनी कोयला गैसीकरण नीति को आत्मनिर्भरता की ओर एक 'ब्रिज' (bridge) के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। चीन जैसे देश भी ईंधन और केमिकल उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर कोयला गैसीकरण का उपयोग कर रहे हैं। भारत में, जिंदल स्टील (Jindal Steel) देश का मुख्य गैसीकरण प्लांट चलाता है, जबकि कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Limited) भी नए प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है। रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries), ओएनजीसी (ONGC) और कोल इंडिया (Coal India) जैसी बड़ी एनर्जी कंपनियां भी इस सेक्टर में अहम भूमिका निभा सकती हैं। यह कदम भारत की रिन्यूएबल एनर्जी (renewable energy) को 500 GW तक बढ़ाने की महत्वाकांक्षी योजना के साथ-साथ चल रहा है।
क्या हैं जोखिम?
लेकिन, इस 'क्लीनर' (cleaner) उपयोग पर जोर देने के बावजूद, कोयला गैसीकरण में बड़े जोखिम भी हैं। यह एक कैपिटल-इंटेंसिव (capital-intensive) प्रक्रिया है जिसमें 5 से 7 साल का लंबा समय लगता है। भारत के कोयले में अक्सर राख की मात्रा ज्यादा होती है, जिसके लिए खास तौर पर विकसित टेक्नोलॉजी की जरूरत पड़ सकती है। पर्यावरण संबंधी चिंताएं भी हैं, जैसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (हालांकि सीधे जलाने से कम हो सकता है), पानी का भारी उपयोग और भूजल प्रदूषण का खतरा। आलोचकों का कहना है कि इससे 'हाई-कार्बन लॉक-इन' (high-carbon lock-in) की स्थिति बन सकती है, जो भविष्य में डीकार्बोनाइजेशन (decarbonization) में बाधा डालेगी और आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं होगा। साथ ही, कोयला गैसीकरण की आर्थिक व्यवहार्यता (economic viability) सस्ते और स्थापित हो चुके रिन्यूएबल एनर्जी विकल्पों से मुकाबला कर रही है, जिनकी लागत तेजी से घट रही है।
सरकार का भरोसा और भविष्य
सरकार का भरोसा इस बात से भी झलकता है कि उन्होंने कोयला लिंकेज (coal linkage) की अवधि को 30 साल तक बढ़ा दिया है, ताकि पॉलिसी में स्थिरता आए और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट (private investment) आकर्षित हो। आखिरकार, इस कोयला गैसीकरण रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि देश की ऊर्जा जरूरतों को पर्यावरण संबंधी चिंताओं और नई टेक्नोलॉजी की आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता के साथ कैसे संतुलित किया जाता है, खासकर तब जब वैश्विक ऊर्जा बाजार तेजी से रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ रहा है।
