भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने एक ऐसी AI-आधारित तकनीक विकसित की है, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में होने वाले मिट्टी सर्वे का समय और खर्च **75%** तक कम हो गया है।
तकनीक कैसे काम करती है?
ICAR के 'नेशनल ब्यूरो ऑफ सॉयल सर्वे एंड लैंड यूज प्लानिंग' (NBSS&LUP) ने यह प्रेडिक्टिव सॉयल-इंटेलिजेंस सिस्टम तैयार किया है। यह सैटेलाइट इमेजिंग, ऐतिहासिक डेटा और मशीन-लर्निंग का इस्तेमाल करके जमीन के नीचे की स्थिति—जैसे कि डेंसिटी और बियरिंग कैपेसिटी—का सटीक अनुमान लगाता है। इस सिस्टम की बदौलत अब केवल 3 लोगों की टीम 1,000 किलोमीटर तक के रूट का सर्वे एक ही दिन में कर सकती है।
कंपनियों को क्या फायदा?
Adani Transmission Ltd., Sterlite Technologies Ltd., Tata Projects Ltd., और KEC International Ltd. जैसी बड़ी कंपनियां पहले ही इस तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं। इससे कंपनियों को जमीन खोदने और नींव बनाने के खर्च का सही अनुमान लगाने में मदद मिलती है। कॉन्ट्रैक्ट मिलने के बाद आने वाली अनचाही दिक्कतों और अतिरिक्त लागत (Cost Overruns) को कम करने में यह तकनीक बेहद कारगर साबित हो रही है।
निवेशकों के लिए जरूरी बात
हालांकि यह तकनीक प्रोजेक्ट मैनेजमेंट में एक गेम-चेंजर है, लेकिन इसे अभी भी एक शुरुआती 'प्रीलिमिनरी' टूल के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। यह डिटेल इंजीनियरिंग सर्वे का विकल्प नहीं है। सुरक्षा और सटीकता के लिए भौतिक सत्यापन (Physical Verification) अभी भी जरूरी है। निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि ICAR एक सरकारी संस्थान है, लेकिन इस तकनीक का उपयोग करने वाली इंफ्रा कंपनियां अपने ऑपरेशंस में सुधार कर मार्जिन बढ़ाने की स्थिति में जरूर हैं।
