Hindalco Industries अब फिनलैंड की कंपनी Metso के साथ मिलकर गुजरात में भारत का पहला इंटीग्रेटेड ई-वेस्ट और सेकेंडरी कॉपर रीसाइक्लिंग प्लांट लगाने जा रही है। ₹2,000 करोड़ के इस निवेश से डोमेस्टिक मिनरल रिकवरी को रफ्तार मिलेगी, लेकिन निवेशकों को कंपनी के बढ़ते कर्ज (Debt) और कैपिटल एक्सपेंडिचर पर नजर रखनी होगी।
Hindalco Industries गुजरात के पखाजन में देश का पहला इंटीग्रेटेड ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग प्लांट तैयार कर रही है। फिनलैंड की कंपनी Metso के साथ इस साझेदारी में Kaldo फर्नेस जैसी अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा। इस प्रोजेक्ट का मुख्य लक्ष्य सालाना 50,000 टन लो-कार्बन कॉपर का प्रोडक्शन करना है, साथ ही इसमें से सोना, चांदी और प्लैटिनम जैसे कीमती धातुओं को भी रिकवर किया जाएगा।
सर्कुलर इकोनॉमी पर जोर
कंपनी अपनी निर्भरता कम करने के लिए पुरानी माइनिंग के बजाय अब सर्कुलर इकोनॉमी की ओर कदम बढ़ा रही है। ई-वेस्ट से धातु निकालकर Hindalco आयातित स्क्रैप और कच्चे माल पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती है, जिससे लंबे समय में प्रोडक्शन कॉस्ट को बेहतर मैनेज किया जा सकेगा।
डेट और एक्सपेंडिचर का गणित
यह कदम कंपनी की सस्टेनेबिलिटी स्ट्रैटेजी का हिस्सा है, लेकिन साथ ही यह भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर के दौर को भी दर्शाता है। Hindalco का कुल नियोजित खर्च ₹50,000 करोड़ तक पहुंच गया है, जिसके चलते कंसोलिडेटेड नेट डेट ₹80,000 करोड़ के स्तर तक जा सकता है। निवेशकों के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है, क्योंकि इतने बड़े निवेश के दौर में कंपनी को अपनी फाइनेंशियल फ्लैक्सिबिलिटी बनाए रखने के लिए मजबूत ऑपरेटिंग कैश फ्लो की जरूरत होगी।
क्या हैं चुनौतियां?
इस ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट की सफलता काफी हद तक कच्चे माल यानी ई-वेस्ट की निरंतर आपूर्ति पर निर्भर करेगी। भारत में ई-वेस्ट मार्केट अभी भी विकसित हो रहा है, ऐसे में प्लांट को फुल कैपेसिटी पर चलाना लॉजिस्टिकल चुनौती हो सकता है। साथ ही, ग्लोबल कमोडिटी प्राइसेज में उतार-चढ़ाव कंपनी के मार्जिन को प्रभावित करने का दम रखते हैं। अब निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि कंपनी इस प्रोजेक्ट को तय समय में कैसे पूरा करती है और कर्ज को कम करने का मैनेजमेंट का क्या प्लान है।
