Nomura Research Institute की एक रिपोर्ट के अनुसार, कंस्ट्रक्शन में 'गैल्वानाइज्ड स्टील' (Galvanised Steel) का इस्तेमाल भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर रखरखाव खर्च को सालाना **₹49,580 करोड़** तक कम कर सकता है।
भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर जंग (corrosion) के कारण हर साल लगभग ₹1.42 लाख करोड़ का नुकसान झेल रहा है, जो देश के GDP में इस सेक्टर के योगदान का करीब 3% है। Nomura Research Institute Consulting & Solutions India की हालिया रिपोर्ट बताती है कि अगर प्रमुख प्रोजेक्ट्स में गैल्वानाइज्ड स्टील का उपयोग बढ़ाया जाए, तो इस भारी नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
लाइफसाइकिल इकोनॉमिक्स का महत्व
अभी ज्यादातर प्रोजेक्ट्स में पारंपरिक 'Thermo-Mechanically Treated (TMT)' बार्स का इस्तेमाल होता है, जिनकी उम्र 40 से 50 साल होती है। इसके उलट, गैल्वानाइज्ड स्टील का इस्तेमाल इंफ्रास्ट्रक्चर की उम्र को 100 साल से भी ज्यादा बढ़ा सकता है। हालांकि शुरुआत में इसकी लागत अधिक आती है, लेकिन बार-बार होने वाले मेंटेनेंस और रिपेयर के खर्च में कटौती से लंबे समय में यह बेहद किफायती साबित होता है।
पॉलिसी में बदलाव की चुनौती
वर्तमान में सरकारी टेंडर्स में 'L1' (सबसे कम बोली लगाने वाला) को प्राथमिकता दी जाती है। इस वजह से ठेकेदार अक्सर सस्ती सामग्री का इस्तेमाल करते हैं, जो बाद में सरकार के लिए सिरदर्द बन जाती है। रिपोर्ट का सुझाव है कि अगर भारत सरकार को ₹49,580 करोड़ की यह बड़ी बचत करनी है, तो उसे 'अपफ्रंट प्राइसिंग' के बजाय 'लाइफसाइकिल परफॉर्मेंस' के आधार पर टेंडरिंग की प्रक्रिया बदलनी होगी।
निवेशकों के लिए संकेत
निवेशकों को उन सरकारी नियमों और बिल्डिंग कोड्स पर नजर रखनी चाहिए जो जंग-रोधी सामग्री को अनिवार्य बनाते हैं। यदि सरकार इंफ्रा खर्च को लंबी अवधि की टिकाऊपन से जोड़ती है, तो प्रीमियम और ट्रीटेड स्टील बनाने वाली कंपनियों के लिए मांग में बड़ा उछाल आ सकता है। मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाईवेज की ओर से आने वाले गाइडलाइंस इस सेक्टर में भविष्य की दिशा तय करेंगे।
