GMDC और NTPC लिमिटेड ने 19 जनवरी 2026 को एक अहम एमओयू (MoU) साइन किया है। इस समझौते के तहत, दोनों कंपनियां कोल और लिग्नाइट के लिए एडवांस्ड गैसिफिकेशन टेक्नोलॉजीज को मिलकर एक्सप्लोर करेंगी।
फाइनेंशियल ईयर 25 (FY25) के आंकड़ों के मुताबिक, GMDC का रेवेन्यू लगभग ₹32,056 मिलियन था, जबकि NTPC ने इसी अवधि में करीब ₹1,745,465 मिलियन का रेवेन्यू दर्ज किया था।
इस कोलैबोरेशन (Collaboration) का मुख्य फोकस GMDC के कोल और लिग्नाइट ब्लॉक्स की गैसिफिकेशन (Gasification) की टेक्नीकल फिजिबिलिटी (Technical Feasibility) का आकलन करना है। इसमें सरफेस (Surface) और अंडरग्राउंड (Underground) गैसिफिकेशन तकनीकों के परीक्षण के लिए पायलट प्रोजेक्ट्स (Pilot Projects) भी शामिल हैं।
यह पार्टनरशिप सिनगैस (Syngas) के कमर्शियल वायबिलिटी (Commercial Viability) और इसके एंड-यूज़ एप्लिकेशन्स (End-use Applications) को समझने पर केंद्रित है। सिनगैस, कोल गैसिफिकेशन का एक अहम उत्पाद है, जिससे GMDC को अपने मिनरल रिजर्व्स से नया वैल्यू ऐड करने का मौका मिलेगा।
NTPC के लिए, यह एनर्जी ट्रांजिशन (Energy Transition) की स्ट्रेटेजी के साथ अलाइन करता है, जिससे इंपोर्टेड फ्यूल्स पर निर्भरता कम होगी और कोयले के क्लीनर यूटिलाइजेशन (Cleaner Utilization) को बढ़ावा मिलेगा।
NTPC पहले से ही कोल गैसिफिकेशन प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है, जैसे कि सिंथेटिक नेचुरल गैस (SNG) प्रोडक्शन। GMDC भी वैल्यू-चेन एक्सपेंशन (Value-chain Expansion) पर ध्यान दे रही है।
इस एमओयू से गैसिफिकेशन की फिजिबिलिटी पर ज्वाइंट स्टडीज का रास्ता खुलेगा। पायलट प्रोजेक्ट्स से प्रोसेस की स्केलेबिलिटी (Scalability) का पता चलेगा और सिनगैस के कमर्शियलाइजेशन (Commercialization) के तरीके खोजे जाएंगे।
हालांकि, एडवांस्ड गैसिफिकेशन टेक्नोलॉजीज की टेक्निकल और कमर्शियल फिजिबिलिटी एक बड़ी चुनौती है, जिसके लिए व्यापक वैलिडेशन (Validation) की ज़रूरत है। इकोनॉमिक माहौल, टैक्स लॉज़ और संभावित लिटिगेशन (Litigation) जैसे रिस्क भी बने हुए हैं।
NTPC के FY25 ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन्स 27.3% थे, नेट प्रॉफिट करीब ₹196,494 मिलियन था। वहीं, GMDC के FY25 ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन्स 22.4% थे, नेट प्रॉफिट लगभग ₹6,858 मिलियन रहा।
निवेशकों को अब GMDC और NTPC द्वारा एक्शन प्लान के डेवलपमेंट, टेक्निकल पार्टनर्स के सेलेक्शन, सिनगैस प्रोडक्शन की टेक्नो-कमर्शियल वायबिलिटी के प्रिलिमिनरी असेसमेंट्स की प्रगति और संबंधित सरकारी पॉलिसी पर नज़र रखनी चाहिए।