GE Aerospace ने भारत में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए बड़ा ऐलान किया है। कंपनी 2030 तक भारत में अपना वार्षिक सप्लायर खर्च दोगुना करके **$400 मिलियन** करेगी। इस विस्तार का मुख्य लक्ष्य भारत में नए एयरक्राफ्ट इंजन डिलीवरी में **90%** हिस्सेदारी हासिल करना और **$5.5 बिलियन** के MRO मार्केट को भुनाना है।
भारत की उड़ान में GE Aerospace की बड़ी भूमिका
भारत के एविएशन सेक्टर में तेजी को देखते हुए GE Aerospace ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन को और मजबूत करने की तैयारी कर ली है। 2025 में यह खर्च लगभग $200 मिलियन था, जिसे 2030 तक दोगुना करके $400 मिलियन करने का लक्ष्य है। फिलहाल भारत में 1,400 से ज्यादा इंजन GE के ही ऑपरेट हो रहे हैं, और कंपनी भविष्य में भी इस वर्चस्व को बनाए रखने की कोशिश में है।
मेक इन इंडिया और MRO का फायदा
देश में 2044 तक 3,300 नए विमानों की मांग आने की उम्मीद है। GE Aerospace पुणे में मैन्युफैक्चरिंग और बेंगलुरु में अपने हाई-टेक इंजीनियरिंग हब का उपयोग करके 'मेक इन इंडिया' रणनीति को रफ्तार दे रही है। इसका सबसे बड़ा फोकस $5.5 बिलियन के मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) सेक्टर पर है। नागपुर जैसी सुविधाओं की तर्ज पर स्थानीय इकोसिस्टम तैयार होने से न केवल एविएशन कंपोनेंट्स की मांग बढ़ेगी, बल्कि डिफेंस और एयरोस्पेस सेक्टर से जुड़े स्थानीय प्लेयर्स के लिए भी ऑर्डर फ्लो बढ़ने की पूरी संभावना है।
रिस्क और चुनौतियां
कंपनी का यह विस्तार काफी महत्वाकांक्षी है, लेकिन इसके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भारतीय एविएशन की डिमांड ग्लोबल इकोनॉमी और फ्यूल कीमतों के प्रति काफी संवेदनशील है। इसके अलावा, ग्लोबल सेफ्टी स्टैंडर्ड्स को पूरा करना और नई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को समय पर खड़ा करना एक बड़ा एग्जीक्यूशन रिस्क हो सकता है। किसी भी तरह की देरी या ग्लोबल डिमांड में कमी आने पर कंपनी के रेवेन्यू टारगेट प्रभावित हो सकते हैं। निवेशकों को आने वाले समय में कंपनी की लोकल सोर्सिंग और नए MRO पार्टनरशिप्स के अपडेट्स पर नजर रखनी चाहिए।
