PLI स्कीम: क्या यह सब्सिडाइज्ड ग्रोथ है या टिकाऊ फायदा?
भारत सरकार की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम, खासकर फूड प्रोसेसिंग सेक्टर के लिए, इन दिनों खूब चर्चा में है। इस स्कीम के तहत 31 दिसंबर 2025 तक, 168 मंज़ूर किए गए आवेदकों ने कुल मिलाकर करीब ₹9,207 करोड़ का भारी-भरकम निवेश किया है। इस निवेश से सालाना 35 लाख मीट्रिक टन की प्रोसेसिंग और प्रिजर्वेशन कैपेसिटी तैयार हुई है। सरकार का लक्ष्य इस स्कीम से 'ग्लोबल फ़ूड मैन्युफैक्चरिंग लीडर्स' तैयार करना और भारतीय ब्रांड्स को विदेशों में मज़बूत बनाना है। अब तक इस स्कीम के तहत ₹2,714.79 करोड़ के इंसेंटिव बांटे जा चुके हैं।
सब्सिडी पर निर्भरता बढ़ाती चिंता
हालांकि, जब हम निवेश के आंकड़ों पर करीब से नज़र डालते हैं, तो पता चलता है कि इसमें सरकारी इंसेंटिव का एक बड़ा हिस्सा शामिल है। बांटे गए ₹2,714.79 करोड़ के इंसेंटिव, कुल रिपोर्टेड निवेश का लगभग 30% हैं। यह दिखाता है कि ग्रोथ बाज़ार की ताकतों से ज़्यादा सरकारी मदद पर टिकी है। यह निर्भरता इस सवाल को जन्म देती है कि क्या यह स्कीम कंपनियों को लंबे समय तक चलने वाला कॉम्पिटिटिव एडवांटेज दे पाएगी या नहीं। वैसे, भारतीय फ़ूड प्रोसेसिंग मार्केट 2033 तक बढ़कर ₹65,244.8 बिलियन होने का अनुमान है, लेकिन PLI सब्सिडी पर ज़्यादा निर्भर कंपनियों का भविष्य अनिश्चित हो सकता है, खासकर जब ये सब्सिडी प्रोग्राम बदलते हैं या खत्म हो जाते हैं।
MSME का शामिल होना: एक दोधारी तलवार
इस स्कीम में 69 MSMEs (माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज) सहित कुल 168 कंपनियों को शामिल किया गया है। यह एक अच्छी बात है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर भागीदारी से बाज़ार का शेयर बंट सकता है और कंपनियों के बड़े, ग्लोबल स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने में मुश्किलें आ सकती हैं। MSMEs के सामने अक्सर पैसों की तंगी, तकनीकी कमियां और बड़ी कंपनियों से कड़ी टक्कर जैसी चुनौतियाँ होती हैं। PLI स्कीम मदद तो करती है, पर ये इन स्ट्रक्चरल समस्याओं को शायद पूरी तरह ठीक न कर पाए, जिससे उनकी इंडिपेंडेंट ग्रोथ धीमी हो सकती है।
सेक्टर की परफॉरमेंस और कॉम्पिटिटिव दबाव
फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री भारत के लिए बहुत अहम है, जो मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट और नौकरियों में बड़ा योगदान देती है। 2025-26 तक यह सेक्टर USD 535 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान है। हालांकि, अलग-अलग कंपनियों की प्रॉफिबिलिटी में ऐतिहासिक रूप से उतार-चढ़ाव रहा है और यह सेक्टर इनपुट लागत, नियमों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के दबाव में रहता है। PLI स्कीम 'ग्लोबल चैंपियंस' बनाने का लक्ष्य रखती है, लेकिन सेक्टर का ओवरऑल परफॉरमेंस और एक्सपोर्ट्स में प्रीमियम प्राइस पाने की क्षमता अभी भी विकसित हो रही है। भारत के कुल एग्री-एक्सपोर्ट्स में प्रोसेस्ड फ़ूड का हिस्सा सिर्फ 16% है, जबकि US में यह 25% और चीन में 49% है। यह दिखाता है कि वैल्यू एडिशन और ब्रांड बनाने में काफी गुंजाइश है।
सस्टेनेबिलिटी और मार्केट डिस्टॉर्शन के जोखिम
सरकार का भारी खर्च, जिसमें PLISFPI प्रोग्राम के लिए ₹10,900 करोड़ शामिल हैं, बाज़ार में कॉम्पिटिशन को बिगाड़ सकता है। जो कंपनियाँ सब्सिडी हासिल करने में माहिर हैं, उन्हें उन कंपनियों पर एक कृत्रिम लागत का फायदा मिल सकता है जो ऐसा नहीं कर पातीं या सरकारी कार्यक्रमों का प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं कर पातीं। इसके अलावा, स्कीम का फोकस डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव्स पर शायद R&D या ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस के लिए ज़रूरी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी अपनाने जैसे अहम क्षेत्रों पर पर्याप्त ध्यान न दे। यह मॉडल, जो सीधे इंसेंटिव्स पर बहुत ज़्यादा निर्भर है, एक सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग बेस बनाने में नाकाम हो सकता है अगर सब्सिडी कम होने पर कंपनियाँ मार्केट-ड्रिवन प्रॉफिट नहीं कमा पातीं। एक और जोखिम यह है कि यह कैपेसिटी क्रिएशन असल डिमांड से ज़्यादा हो सकती है, जिससे कुछ सेगमेंट्स में ओवरसप्लाई और कीमतों में गिरावट आ सकती है।
भविष्य की राह
इन चिंताओं के बावजूद, फ़ूड प्रोसेसिंग सेक्टर में आगे भी ग्रोथ की उम्मीद है। बदलती कंज्यूमर प्रेफरेंस, जो सुविधाजनक और हेल्दी प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ रही है, और PLI व PMKSY जैसी सरकारी पहलों का सपोर्ट इसमें मदद करेगा। मार्केट के विस्तार का अनुमान इसके अंडरलाइंग स्ट्रेंथ को दिखाता है। लेकिन, लंबी अवधि की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सेक्टर इंसेंटिव-ड्रिवन ग्रोथ से इंडिपेंडेंट मार्केट लीडरशिप की ओर बढ़े, इनोवेशन को बढ़ावा दे और ब्रांड वैल्यू मज़बूत करे। PLI स्कीम को सही मायने में 'ग्लोबल चैंपियंस' बनाने के लिए, कंपनियों को सब्सिडी के भुगतान से स्वतंत्र होकर प्रॉफिबिलिटी और कॉम्पिटिटिव स्ट्रेंथ दिखानी होगी।