भारत के इंजीनियरिंग सेक्टर को बैंकों से मिलने वाले कर्ज में ज़बरदस्त उछाल आया है। मई 2026 तक, इस सेक्टर का बैंक क्रेडिट **₹3.24 लाख करोड़** तक पहुंच गया, जो पिछले तीन सालों में **17.6%** की सालाना ग्रोथ को दर्शाता है। यह इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी खर्च और बढ़ती इंडस्ट्रियल डिमांड का नतीजा है।
Detailed Coverage
इंफ्रा और सरकारी योजनाओं का कमाल
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लेटेस्ट आंकड़ों के मुताबिक, भारत का इंजीनियरिंग सेक्टर बैंक फाइनेंसिंग के लिए सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला क्षेत्र बन गया है। 31 मई 2026 तक, इंजीनियरिंग इंडस्ट्री को मिलने वाला बकाया बैंक क्रेडिट ₹3.24 लाख करोड़ तक पहुँच गया। यह पिछले तीन सालों में 17.6% के कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ा है। यह परफॉरमेंस भारत में मौजूदा इंडस्ट्रियल विस्तार और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के दौर में इस सेक्टर की अहम भूमिका को बताता है।
दूसरे सेक्टर्स से तुलना
इंजीनियरिंग सेक्टर ने ग्रोथ परसेंटेज में बाजी मारी है, लेकिन दूसरे सेक्टर्स में भी उधार लेने वालों की संख्या में अच्छी बढ़ोतरी हुई है। जेम्स और ज्वेलरी सेक्टर ने 12.4% की सालाना ग्रोथ दर्ज की, जबकि पेट्रोलियम, कोयला उत्पाद और परमाणु ईंधन सेगमेंट 11.5% बढ़ा। वहीं, बेसिक मेटल और मेटल प्रोडक्ट इंडस्ट्री का कुल क्रेडिट वॉल्यूम सबसे ज्यादा ₹5.22 लाख करोड़ है, लेकिन इसकी ग्रोथ रेट 10.3% पर अपेक्षाकृत धीमी रही। ये आंकड़े बताते हैं कि बैंक सरकारी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स से सीधे जुड़े सेक्टर्स को कर्ज देने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
डिमांड-ड्रिवन है ये उछाल
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह क्रेडिट उछाल काफी हद तक डिमांड की वजह से है। बैंक खुद कंपनियों को कर्ज नहीं दे रहे, बल्कि बढ़ती इंडस्ट्रियल एक्टिविटी और कैपिटल स्पेंडिंग की जरूरतें ज़्यादा फाइनेंसिंग की मांग कर रही हैं। इंजीनियरिंग और कैपिटल गुड्स स्पेस में, क्रेडिट की लगातार मांग एक्टिव प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन और विस्तार योजनाओं को दर्शाती है, जो सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट पर फोकस के अनुरूप हैं।
PLI स्कीम का बड़ा योगदान
प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम जैसी खास सरकारी पहलों ने क्रेडिट की मांग को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में क्रेडिट ग्रोथ 14.1% देखी गई है, जिसे मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग और प्रोडक्शन में विस्तार से काफी बढ़ावा मिला है। अर्थशास्त्री यह भी बताते हैं कि ग्रोथ सिर्फ कैपिटल-इंटेंसिव सेक्टर्स तक ही सीमित नहीं है। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में कंज्यूमर डिमांड बढ़ने से एडिबल ऑयल और वनस्पति जैसे उद्योगों में क्रेडिट विस्तार को सपोर्ट मिला है, जो 15.5% बढ़ा है।
निवेशकों के लिए संकेत
निवेशकों के लिए, यह बदलाव इस बात का संकेत देता है कि बैंक पारंपरिक कॉर्पोरेट लोन के अलावा भी कमाई के अच्छे रास्ते ढूंढ रहे हैं। इस क्रेडिट ग्रोथ की स्थिरता काफी हद तक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लगातार एग्जीक्यूशन और डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसीज की सफलता पर निर्भर करेगी। जबकि कंज्यूमर-फेसिंग सेक्टर्स महंगाई और प्रति व्यक्ति आय के ट्रेंड्स के आधार पर अलग-अलग परफॉरमेंस दिखा सकते हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े सेक्टर्स फिलहाल डोमेस्टिक इन्वेस्टमेंट के स्टेबल माहौल का फायदा उठा रहे हैं। निवेशक शायद इस बात पर नज़र रखेंगे कि यह क्रेडिट मोमेंटम इन हाई-ग्रोथ क्रेडिट सेक्टर्स में कंपनियों के रेवेन्यू और प्रॉफिट मार्जिन में सुधार में तब्दील होता है या नहीं, क्योंकि आने वाली तिमाहियों में कर्ज की बढ़ती लागत या प्रोजेक्ट में देरी से बॉटम लाइन्स पर दबाव पड़ सकता है।
