कॉपर की कीमतों में उछाल के चलते भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां अब एल्युमीनियम और स्टील का इस्तेमाल कर रही हैं। यह कदम गिरते मार्जिन को बचाने और मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट को कम करने के लिए उठाया गया है।
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए यह साल चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। कॉपर की कीमतों में साल-दर-साल 45% तक का उछाल आया है, जिससे कंपनियों के मुनाफे पर भारी दबाव है। इसे मैनेज करने के लिए कंपनियां अब 'वैल्यू इंजीनियरिंग' का इस्तेमाल कर रही हैं, जिसमें मोटर वाइंडिंग और ट्रांसफार्मर जैसे कलपुर्जों में कॉपर की जगह एल्युमीनियम और स्टील का उपयोग किया जा रहा है। इस बदलाव से मैन्युफैक्चरिंग लागत में 2% से 6% तक की कटौती का लक्ष्य रखा गया है।\n\n### मार्जिन पर बढ़ता दबाव\nकंपनियों की ऑपरेटिंग मार्जिन डबल डिजिट से घटकर सिंगल डिजिट में आ गई है। दिक्कत यह है कि साल 2026 की शुरुआत से लगातार कई बार कीमतें बढ़ाने के बाद, अब ग्राहकों पर और बोझ डालना मुश्किल हो रहा है। इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डेटा सेंटर्स और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेक्टर की ओर से कॉपर की भारी डिमांड ने सप्लाई चेन को और भी सीमित कर दिया है।\n\n### लोकल मैन्युफैक्चरिंग पर जोर\nलागत घटाने के लिए कंपनियां अब लोकल मैन्युफैक्चरिंग पर दांव लगा रही हैं। PG Electroplast ने अपनी क्षमताओं को बढ़ाते हुए नए रोटरी कंप्रेसर प्लांट शुरू करने की योजना बनाई है। वहीं, LG Electronics India जैसी कंपनियां भी इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने के लिए रेजिन (Resins) का प्रोडक्शन स्थानीय स्तर पर करने की कोशिश कर रही हैं।\n\n### निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?\nनिवेशकों की नजर इस बात पर है कि क्या इन सस्ते विकल्पों से प्रोडक्ट की क्वालिटी और परफॉर्मेंस बनी रहेगी? अगर कंज्यूमर्स को क्वालिटी में गिरावट महसूस हुई, तो इसका असर सीधे ब्रांड इमेज पर पड़ेगा। इसके साथ ही, अनिश्चित मौसम के कारण कूलिंग प्रोडक्ट्स की बिक्री प्रभावित हुई है, जिससे डीलर्स भी इन्वेंट्री को लेकर सतर्क हैं। अब सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां लागत घटाते हुए अपने प्रोडक्ट्स को कितना भरोसेमंद बनाए रख पाती हैं।
