सरकार का बड़ा फैसला: ECLGS 5.0 को मिली मंजूरी
भारत के केंद्रीय कैबिनेट ने देश के महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, विशेष रूप से MSMEs के लिए इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ECLGS) 5.0 को हरी झंडी दे दी है। यह कदम वैश्विक सप्लाई चेन में आ रही बाधाओं और अनिश्चितताओं के बीच इन व्यवसायों को सहारा देने के लिए उठाया गया है। India Electronics and Semiconductor Association (IESA) भी इस पहल का समर्थन कर रही है।
स्कीम के फायदे और वित्तीय सहायता
यह स्कीम MSMEs को 100% क्रेडिट गारंटी प्रदान करती है, साथ ही फीस में छूट और अतिरिक्त वर्किंग कैपिटल की सुविधा भी देती है। भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर की रीढ़ माने जाने वाले MSMEs को इससे तत्काल राहत मिलने की उम्मीद है। ECLGS 5.0 के तहत, वैश्विक आर्थिक हालातों के कारण उत्पन्न लिक्विडिटी दबाव को कम करने के लिए ₹2.55 लाख करोड़ तक का अतिरिक्त क्रेडिट उपलब्ध कराया जाएगा।
इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर के बड़े लक्ष्य
भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लक्ष्य बड़े हैं – 2026 तक $300 बिलियन और 2030 तक $500 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। MSMEs इस विजन का अहम हिस्सा हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) जैसे पहलों में MSMEs की भागीदारी 80% रही है। इसके अलावा, India Semiconductor Mission (ISM) ₹76,000 करोड़ के समर्थन के साथ भारत को सेमीकंडक्टर हब बनाने पर काम कर रही है, जिसमें MSMEs के लिए सप्लाई चेन की भूमिकाएं तलाशी जा रही हैं।
अन्य सरकारी पहलें
ECLGS 5.0 के अलावा, सरकार कई अन्य योजनाओं से भी इस सेक्टर को बढ़ावा दे रही है। प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम ने, खासकर मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग में, भारी निवेश आकर्षित किया है। Design Linked Incentive (DLI) स्कीम चिप डिजाइन का समर्थन करती है। CGTMSE जैसी क्रेडिट गारंटी योजनाएं भी MSMEs को कोलेटरल-फ्री क्रेडिट देती आई हैं।
लागत और आयात की चुनौतियां
हालांकि, सरकारी सहायता के बावजूद, भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग की लागत अन्य एशियाई हब की तुलना में 10-20% अधिक बनी हुई है। क्रिटिकल कंपोनेंट्स जैसे PCB और सेमीकंडक्टर के लिए 85-90% तक आयात पर निर्भरता लागत दबाव और अस्थिरता पैदा करती है। ECLGS 5.0 लिक्विडिटी तो प्रदान करेगी, लेकिन यह उन्नत मैन्युफैक्चरिंग के लिए लागत प्रतिस्पर्धात्मकता हासिल करने की मूलभूत चुनौती का समाधान नहीं करती।
वैल्यू चेन में एकीकरण की बाधाएं
घरेलू सप्लाई चेन का निर्माण, विशेष रूप से उच्च-मूल्य वाले कंपोनेंट्स और सटीक पुर्जों के लिए, एक बड़ी बाधा बनी हुई है। MSMEs के लिए टेक्नोलॉजी को अपनाना और उन्नत मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू चेन में गहराई से एकीकृत होना अभी भी एक बड़ी चुनौती है।
वैश्विक परिदृश्य और भविष्य
वैश्विक सप्लाई चेन में 'चाइना+1' रणनीति के तहत भारत की ओर झुकाव बढ़ रहा है, लेकिन लागत की बाधाएं और आयात पर निर्भरता भारत के लिए चुनौती पेश करती हैं। भविष्य के अनुमानों में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में मजबूत वृद्धि दिखाई गई है, 2030 तक $600 बिलियन से अधिक तक पहुंचने की उम्मीद है। ECLGS 5.0 की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह MSMEs को सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने और 'मेक इन इंडिया, मेक फॉर द वर्ल्ड' रणनीति को अपनाने में कितनी प्रभावी ढंग से सक्षम बनाती है।
