Data Centre Power Stocks: AI की भारी डिमांड के बीच गिरे दाम, क्या अब मुनाफे पर लगा ब्रेक?

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Data Centre Power Stocks: AI की भारी डिमांड के बीच गिरे दाम, क्या अब मुनाफे पर लगा ब्रेक?

AI डेटा सेंटर्स की बढ़ती मांग से पावर और कूलिंग कंपनियों की ऑर्डर बुक तो फुल है, लेकिन अब निवेशकों की चिंता बढ़ रही है। ग्रिड कनेक्टिविटी में देरी और ऊंचे वैल्यूएशन के कारण इन शेयरों में दबाव देखा जा रहा है।

ग्लोबल AI बूम के कारण डेटा सेंटर्स बनाने की होड़ मची है, जिससे अब सारा ध्यान चिप बनाने वाली कंपनियों से हटकर उन कंपनियों पर आ गया है जो इन्हें बिजली और कूलिंग जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराती हैं। डेटा सेंटर्स की बढ़ती संख्या के साथ ट्रांसफॉर्मर और लिक्विड कूलिंग सिस्टम की सप्लाई चेन में भारी दबाव देखने को मिल रहा है।

ट्रांसफॉर्मर की किल्लत और चुनौतियां

फिलहाल ट्रांसफॉर्मर सप्लाई सबसे बड़ा अड़चन बनी हुई है। साउथ कोरिया की HD Hyundai Electric ने 2026 की दूसरी तिमाही के लिए $8.49 बिलियन की ऑर्डर बुक दिखाई है, जो पिछले साल के मुकाबले 29.6% ज्यादा है। वहीं, चीन की Hainan Jinpan Smart Technology के डेटा सेंटर ऑर्डर्स में इस साल की पहली छमाही में 4 गुना उछाल आया है। कंपनियां अब पुरानी कॉपर-वाइंडिंग की जगह सेमीकंडक्टर आधारित सॉलिड-स्टेट ट्रांसफॉर्मर पर शिफ्ट हो रही हैं, जो एनर्जी एफिशिएंसी को 4% तक बेहतर बनाते हैं।

लिक्विड कूलिंग की बढ़ती मांग

AI चिप्स से निकलने वाली भारी गर्मी के कारण अब एयर-कूलिंग का दौर खत्म हो रहा है। उम्मीद है कि 2030 तक 70% नए डेटा सेंटर्स में लिक्विड कूलिंग का इस्तेमाल होगा, जो अभी महज 30% है। इससे Delta Electronics, Asia Vital Components, Auras Technology और Shenzhen Envicool Technology जैसी कंपनियों के लिए बिजनेस के नए रास्ते खुल गए हैं।

निवेशकों के लिए जोखिम और सावधानी

शानदार रेवेन्यू के बावजूद शेयर बाजार अब काफी सिलेक्टिव हो गया है। 2025 की जबरदस्त रैली के बाद अब निवेशक यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या शेयर का दाम फंडामेंटल्स से आगे निकल गया है। सबसे बड़ी दिक्कत मांग की नहीं, बल्कि काम पूरा करने की रफ्तार है। कई विकसित बाजारों में नए डेटा सेंटर के लिए ग्रिड कनेक्शन मिलने में 8 साल तक का समय लग सकता है, जिसका मतलब है कि ऑर्डर बुक के रेवेन्यू में बदलने में लंबा समय लगेगा।

इसके अलावा, मैनेजमेंट का मानना है कि प्रॉफिट मार्जिन में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी की उम्मीद नहीं है। बढ़ती लागत और तगड़े कॉम्पिटिशन के कारण कंपनियों की कीमतें बढ़ाने की क्षमता सीमित है। निवेशकों के लिए अब बिना सोचे-समझे निवेश करने का दौर खत्म हो गया है। अब बाजार का फोकस उन कंपनियों पर है जो प्रोजेक्ट की समयसीमा को बिना किसी एक्स्ट्रा कॉस्ट के पूरा करने में सक्षम हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.