भारत का कोरुगेटेड बॉक्स उद्योग गंभीर संकट से जूझ रहा है। क्राफ्ट पेपर की कीमतों में **25%** की बढ़ोतरी ने **25,000** से ज्यादा MSME इकाइयों के सामने अस्तित्व का खतरा पैदा कर दिया है।
भारतीय कोरुगेटेड बॉक्स उद्योग इस समय एक बड़े ऑपरेशनल संकट से गुजर रहा है। मैन्युफैक्चरर्स को क्राफ्ट पेपर की बढ़ती कीमतों से जूझना पड़ रहा है, जो किसी भी बॉक्स की कुल प्रोडक्शन लागत का 65% से 80% हिस्सा होता है। पिछले दो महीनों में कीमतों में 25% से 30% तक का इजाफा हुआ है, जिससे MSMEs का मुनाफा पूरी तरह खत्म होता दिख रहा है।
GST का उलझा हुआ गणित
इस संकट को 'इनवर्टेड GST' स्ट्रक्चर ने और हवा दे दी है। कंपनियां क्राफ्ट पेपर खरीदने पर 18% GST चुकाती हैं, लेकिन अपने तैयार माल (बॉक्स) को बेचते समय सिर्फ 5% GST वसूलती हैं। इस अंतर के कारण कंपनी का काफी कैश इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के रूप में अटक जाता है। Western India Corrugated Box Manufacturers Association (WICMA) ने इसे लिक्विडिटी क्रंच का सबसे बड़ा कारण बताया है, क्योंकि रिफंड मिलने में काफी लंबा समय लगता है।
सप्लायरों की सख्ती और वर्किंग कैपिटल का संकट
समस्या सिर्फ कच्चे माल की कीमतों तक सीमित नहीं है। अब वेंडर भी सख्त हो गए हैं। पहले जो सप्लायर 30 से 60 दिन का क्रेडिट देते थे, वे अब महज 7 दिन के भीतर पेमेंट मांग रहे हैं। इसके साथ ही स्टार्च और कोयला जैसी अन्य चीजों के दाम बढ़ने से कंपनियों का वर्किंग कैपिटल मैनेजमेंट बिगड़ गया है।
अब आगे क्या?
फार्मा, ऑटोमोबाइल और ई-कॉमर्स जैसे बड़े सेक्टर के क्लाइंट्स के साथ फिक्स्ड-प्राइस कॉन्ट्रैक्ट होने के कारण छोटे मैन्युफैक्चरर्स के लिए कीमतें बढ़ाना बड़ी चुनौती है। यदि सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट्स पर दोबारा बातचीत नहीं हुई, तो कई छोटी इकाइयां अपना प्रोडक्शन बंद करने पर मजबूर हो सकती हैं। निवेशकों को अब इस पर नजर रखनी चाहिए कि क्या सरकार GST रिफंड नियमों में ढील देती है या कच्चे माल पर ड्यूटी में कोई बदलाव होता है जिससे बाजार में स्थिरता आए।
