प्रोडक्शन रुकने की असली वजहें
इस संकट की जड़ें मिडिल ईस्ट में जारी भू-राजनीतिक तनाव से जुड़ी हैं, जिसके चलते कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की भारी किल्लत हो गई है। मार्च की शुरुआत से ही कोयंबटूर के कई MSMEs प्रोडक्शन रोकने को मजबूर हुए हैं। जिन उद्योगों में फैब्रिकेशन, लेज़र कटिंग, पाउडर कोटिंग और टेक्सटाइल प्रोसेसिंग जैसे काम होते हैं, वे LPG पर बहुत निर्भर हैं और इस कमी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
सिर्फ LPG की किल्लत ही नहीं, बल्कि रॉ मटेरियल की बढ़ती लागत भी इस आग में घी का काम कर रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले चार महीनों में स्टील की कीमतों में 15% से 25% तक का इजाफा हुआ है। एल्युमीनियम की डोमेस्टिक कीमतें फ्यूल की बढ़ती लागत के चलते जनवरी 2026 में रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गईं। कॉपर की कीमतें भी जनवरी 2026 में रिकॉर्ड स्तर पर देखी गईं और साल-दर-साल इनमें बढ़त दर्ज की गई। इतना ही नहीं, प्लास्टिक और पॉलिमर्स के दाम भी तेजी से चढ़े हैं, शुरुआती मार्च 2026 तक कुछ मामलों में इनमें 70% तक की बढ़ोतरी देखी गई। यह सब क्रूड ऑयल और नैफ्था की बढ़ती कीमतों के चलते हुआ है।
पूरे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर मंडरा रहा धीमापन
कोयंबटूर की यह हालत पूरे भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आ रहे धीमेपन का ही एक बड़ा संकेत है। HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) मार्च 2026 में गिरकर 53.8 पर आ गया, जो सितंबर 2021 के बाद सबसे निचला स्तर है। फरवरी में यह 56.9 था। इस गिरावट की वजहें मिडिल ईस्ट के तनाव, बढ़ती महंगाई और कमजोर पड़ती डोमेस्टिक डिमांड मानी जा रही हैं। केमिकल्स, स्टील और एनर्जी जैसे मटीरियल की इनपुट कॉस्ट पिछले करीब चार सालों में सबसे तेजी से बढ़ी है। हालांकि MSMEs पर इसका असर सबसे ज्यादा है, लेकिन यह धीमापन पूरे इंडस्ट्रियल सेक्टर के लिए चिंता का विषय है।
MSMEs पर क्यों पड़ी सबसे ज्यादा मार?
भारत के उद्योग और एक्सपोर्ट की रीढ़ माने जाने वाले MSMEs इन झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। ये छोटे उद्यम अक्सर कम प्रॉफिट मार्जिन और सीमित कैपिटल के साथ काम करते हैं, जिससे बढ़ती एनर्जी और रॉ मटेरियल की लागत को झेलना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। कई MSMEs इंपोर्टेड मटीरियल और टेक्नोलॉजी पर निर्भर करते हैं, जो उन्हें ग्लोबल सप्लाई चेन इश्यूज और करेंसी डीवैल्यूएशन के प्रति और भी कमजोर बना देता है। मौजूदा LPG संकट, जो मिडिल ईस्ट की घटनाओं और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे शिपिंग रूट्स पर असर डालने वाली भू-राजनीतिक वजहों से और बिगड़ा है, इस निर्भरता को उजागर करता है। सिर्फ कुछ दिनों की LPG सप्लाई बाकी रहने से यह इंडस्ट्रियल सेक्टर की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए बड़े जोखिमों को दिखाता है। कोविड-19 पेंडेमिक जैसी पिछली बाधाओं ने भी MSME सप्लाई चेन में बड़ी कमजोरियां दिखाई थीं, जिससे मटीरियल की कमी और प्रोडक्शन में देरी हुई थी।
अर्थव्यवस्था पर बढ़ती चिंताएं
एनर्जी सप्लाई की समस्या और इनपुट कॉस्ट में हो रही बढ़ोतरी का यह मेल भारत की इकोनॉमी के लिए एक बड़ा इन्फ्लेशन रिस्क पैदा कर रहा है। एनर्जी की ऊंची कीमतें करंट अकाउंट डेफिसिट को बढ़ा सकती हैं और रुपये को कमजोर कर सकती हैं, जिससे इंपोर्ट और महंगा हो जाएगा। MSMEs के लिए, फिक्स्ड कॉन्ट्रैक्ट्स या कॉम्पीटिशन के चलते इन बढ़ी हुई लागतों को आगे पास ऑन करने में संघर्ष करना कैश फ्लो प्रॉब्लम्स, डिलेड पेमेंट्स और डिफॉल्ट्स का कारण बन सकता है। मौजूदा हालात मार्केट सेंटीमेंट को और सतर्क बना सकते हैं, जिसका असर स्टॉक मार्केट्स और फॉरेन इन्वेस्टमेंट पर पड़ सकता है।
इंडस्ट्री का भविष्य क्या?
हालांकि सरकार LPG सप्लाई बहाल करने और कंज्यूमर्स को सपोर्ट करने के लिए काम कर रही है, लेकिन लगातार जारी भू-राजनीतिक तनाव और ग्लोबल कमोडिटी प्राइस पर उनका असर एक अस्थिर ऑपरेटिंग एन्वायरनमेंट बना रहा है। भारत का MSME सेक्टर इन संयुक्त दबावों - एनर्जी की कमी, कॉस्ट इन्फ्लेशन और सप्लाई चेन इश्यूज - से कैसे निपटता है, यह इंडस्ट्रियल ग्रोथ और रोजगार के लिए महत्वपूर्ण होगा। यह ट्रेंड प्रॉफिट पर लगातार दबाव और सप्लाई चेन के पूरी तरह स्थिर न होने पर प्रोडक्शन हॉल्ट के उच्च जोखिम का संकेत दे रहा है।