ग्लोबल स्टील प्रोडक्शन: कोयले से बुने सपने, जलवायु लक्ष्य खतरे में

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
ग्लोबल स्टील प्रोडक्शन: कोयले से बुने सपने, जलवायु लक्ष्य खतरे में
Overview

दुनिया भर में स्टील बनाने के लिए कोयले का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है, जिससे जलवायु लक्ष्यों (Climate Targets) पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। पिछले कुछ समय में कोयले से चलने वाली स्टील उत्पादन क्षमता में **5%** का इजाफा हुआ है, जो कि चिंताजनक है।

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कोयले पर निर्भरता क्यों बढ़ रही है?

दुनिया भर में स्टील इंडस्ट्री की क्षमता 319 मिलियन टन सालाना तक पहुंच गई है, और यह कोयले के दम पर तेजी से बढ़ रही है, जो कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से लड़ने के प्रयासों के बिल्कुल विपरीत है। यह वृद्धि, बंद की जा रही पुरानी फैक्ट्रियों से कहीं ज्यादा है। अनुमान है कि 2035 तक स्टील उत्पादन की नेट क्षमता 88 मिलियन टन तक बढ़ सकती है।

क्लीन टेक्नोलॉजी पीछे छूट रही है?

दूसरी ओर, इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) जैसी साफ-सुथरी टेक्नोलॉजी, जो स्क्रैप मेटल और बिजली का इस्तेमाल करती है, की हिस्सेदारी वैश्विक क्षमता में सिर्फ 34% तक ही सीमित है। डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI) टेक्नोलॉजी, जो कम उत्सर्जन का एक अहम रास्ता है, कुल आयरनमेकिंग क्षमता का केवल 10% है। सबसे चिंता की बात यह है कि DRI उत्पादन का मात्र 2% ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग करता है, जो कि सबसे पर्यावरण-अनुकूल विकल्प है। कोयले पर यह निर्भरता इसलिए गहरी हो रही है क्योंकि स्टील इंडस्ट्री के 88% CO2 उत्सर्जन का जरिया कोयला-आधारित ब्लास्ट फर्नेस ही हैं।

भारत और चीन का बड़ा दांव

इस कोयला आधारित क्षमता विस्तार में भारत और चीन सबसे आगे हैं। ये दोनों देश 86% नई सुविधाओं के लिए जिम्मेदार हैं। अकेले भारत दुनिया की 60% से ज्यादा नई कोयला-आधारित ब्लास्ट फर्नेस क्षमता विकसित कर रहा है, जिसमें 93% आयरनमेकिंग कोयले पर निर्भर होगी। हालांकि, भारत की 5% से कम परियोजनाओं पर काम शुरू हुआ है, जो नीतिगत बदलाव का मौका दे सकती है।

वित्तीय जोखिम और चुनौतियां

कोयले पर इस निर्भरता के गंभीर वित्तीय जोखिम भी हैं। यूरोपीय संघ (European Union) का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM), जो 2026 से लागू होगा, आयातित स्टील पर कार्बन मूल्य लगाएगा। इससे भारत जैसे देशों की लागत 32% तक बढ़ सकती है।

ग्रीन हाइड्रोजन जैसी बिल्कुल क्लीन स्टीलमेकिंग टेक्नोलॉजी के लिए अभी भारी निवेश और लागत में कमी की जरूरत है। ग्रीन हाइड्रोजन की कीमत अभी जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) से कहीं ज्यादा है। इसे सस्ता करने के लिए $1.4-$1.70 प्रति किलोग्राम तक लाना होगा, जिसके लिए रिन्यूएबल एनर्जी (renewable energy) और इलेक्ट्रोलाइज़र टेक्नोलॉजी (electrolyzer technology) में बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता है।

लंबी अवधि के खतरे

इसके अलावा, मेटलर्जिकल कोयले की कीमतों में उतार-चढ़ाव और कुछ कंपनियों पर भारी कर्ज (debt) भी जोखिम पैदा करते हैं। ब्लास्ट फर्नेस जैसी पुरानी एसेट्स (assets) का लंबा जीवनकाल उन्हें 'स्ट्रैंडेड एसेट्स' बना सकता है, जो भविष्य में फायदे का सौदा न रहें।

जलवायु लक्ष्यों से टकराव

यह कोयले पर निर्भरता ग्लोबल क्लाइमेट गोल्स (Climate Goals) के खिलाफ है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के अनुसार, 2050 तक नेट-जीरो (net-zero) लक्ष्य हासिल करने के लिए भारी इंडस्ट्री से CO2 उत्सर्जन में 93% की कमी लानी होगी। लेकिन नई कोयला क्षमता में हो रही वृद्धि इन प्रयासों को सीधे तौर पर कमजोर कर रही है।

हालांकि कई बड़ी स्टील कंपनियों ने नेट-जीरो लक्ष्य तय किए हैं, पर उनके प्लान में ठोस समय-सीमा या रणनीति का अभाव है। कोयले पर जारी निर्भरता सप्लाई चेन के जोखिम और कीमतों की अस्थिरता को भी बढ़ाती है। नीतिगत दखल (policy intervention) के लिए वक्त तेजी से कम हो रहा है, खासकर भारत में उन परियोजनाओं के लिए जो अभी शुरू नहीं हुई हैं। बिना किसी निर्णायक बदलाव के, स्टील सेक्टर लंबे समय तक भारी कार्बन फुटप्रिंट बनाए रखने का जोखिम उठा रहा है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.