भारत के ऑटो कंपोनेंट सेक्टर का टर्नओवर FY26 में ₹7.60 लाख करोड़ रहा, लेकिन चीन से आयात पर निर्भरता FY25 के **29%** से बढ़कर **36%** हो गई है। यह दिखाता है कि घरेलू उत्पादन बढ़ने के बावजूद हम सब-असेंबली और कंपोनेंट्स के लिए चीन पर ज़्यादा निर्भर हो रहे हैं।
ऑटो कंपोनेंट सेक्टर का बढ़ता कारोबार
फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में भारतीय ऑटोमोटिव कंपोनेंट इंडस्ट्री का टर्नओवर ₹7.60 लाख करोड़ दर्ज किया गया। यह पिछले साल के मुकाबले 12.7% की ग्रोथ दिखाता है, जिसका मुख्य कारण घरेलू गाड़ियों की ज़बरदस्त डिमांड और उत्पादन क्षमता में वृद्धि है।
चीन पर बढ़ती निर्भरता का सच
सेक्टर की तरक्की के बावजूद, ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ACMA) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। चीन से आयात होने वाले कंपोनेंट्स का हिस्सा बढ़कर कुल आयात का 36% हो गया है, जबकि पिछले फाइनेंशियल ईयर में यह सिर्फ 29% था। भारत एक्सपोर्ट में एक अहम खिलाड़ी है, जहाँ अमेरिका 26% एक्सपोर्ट के साथ सबसे बड़ा खरीदार है, लेकिन आयात के आंकड़े एक बड़ी निर्भरता की ओर इशारा करते हैं।
आयात बढ़ने की मुख्य वजहें
इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि इस बढ़ते आयात के पीछे कई कारण हैं। इसमें भारत में मौजूद ग्लोबल ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) की खास टेक्नोलॉजिकल ज़रूरतें, मौजूदा ओवरसीज़ मदर प्लांट्स को प्राथमिकता देने वाली सप्लाई चेन पॉलिसी और चीनी कंपोनेंट्स की किफायती कीमतें शामिल हैं। साथ ही, जब घरेलू गाड़ियों का उत्पादन लोकल कंपोनेंट सप्लाई के विकास से ज़्यादा तेज़ी से बढ़ता है, तो प्रोडक्शन में देरी से बचने के लिए OEMs अक्सर ग्लोबल सोर्सिंग का रुख करते हैं।
घरेलू निर्माताओं पर असर
आने वाले फाइनेंशियल ईयर में सेक्टर में 8-10% की ग्रोथ का अनुमान है, लेकिन चीन पर यह भारी निर्भरता लोकल मैन्युफैक्चरर्स के लिए एक जटिल स्थिति पैदा करती है। कंपनियाँ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स जैसे इंटरनेशनल इंटीग्रेशन के फायदों और सप्लाई चेन कंसंट्रेशन के जोखिमों के बीच संतुलन बना रही हैं। घरेलू सप्लायर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती हाई-टेक्नोलॉजी कंपोनेंट्स को लोकल स्तर पर उपलब्ध कराना है। जब घरेलू उत्पादन नई गाड़ी मॉडल्स की कॉस्ट या टेक्निकल स्पेसिफिकेशन्स को पूरा नहीं कर पाता, तो आयात पर निर्भरता बनी रह सकती है, जो डोमेस्टिक प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकती है।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
भविष्य में, निवेशकों के लिए यह देखना अहम होगा कि क्या भारतीय ऑटो कंपोनेंट कंपनियाँ लोकल कैपिटल स्पेंडिंग और टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप के ज़रिए इस निर्भरता को कम कर पाती हैं। जो कंपनियाँ अपनी लोकल मैन्युफैक्चरिंग कैपेबिलिटीज़ बढ़ा रही हैं, उनकी परफॉर्मेंस पर नज़र रखना ज़रूरी होगा। ACMA से सप्लाई चेन लोकलाइजेशन के प्रयासों और क्रिटिकल सब-असेंबली के आयात से जुड़ी सरकारी नीतियों में किसी भी बदलाव पर नज़र रखना आने वाली तिमाहियों में महत्वपूर्ण होगा।
