Q2 FY27 में सीमेंट कंपनियों के वॉल्यूम में **6-7%** की अच्छी ग्रोथ दिखी है, लेकिन एनर्जी की बढ़ती लागत के आगे यह फीकी पड़ गई है। पेटकोक की कीमतों में **30-35%** का उछाल कंपनियों के मार्जिन पर भारी पड़ रहा है।
भारतीय सीमेंट इंडस्ट्री इस वक्त दोराहे पर खड़ी है। एक तरफ बाजार में डिमांड मजबूत है, तो दूसरी तरफ बढ़ती ऑपरेशनल लागत ने मुनाफा निगल लिया है। वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में कंपनियों ने सालाना आधार पर 6% से 7% की वॉल्यूम ग्रोथ तो दर्ज की है, लेकिन यह बढ़त प्रॉफिट में नहीं बदल पा रही है।
ऊर्जा संकट की मार
इस फाइनेंशियल दबाव की मुख्य वजह ग्लोबल एनर्जी मार्केट में मची उथल-पुथल है। वेस्ट एशिया में चल रहे तनाव के कारण पेटकोक, थर्मल कोल और कच्चे तेल के भाव अनिश्चित बने हुए हैं। आंकड़ों के मुताबिक, इंपोर्टेड पेटकोक की कीमतें क्वार्टर-ऑन-क्वार्टर आधार पर 30% से 35% तक उछल गई हैं। चूंकि सीमेंट बनाना एक एनर्जी-इंटेंसिव काम है, इसलिए ईंधन के महंगे होने का सीधा असर बैलेंस शीट पर पड़ रहा है।
ग्राहकों पर बोझ डालना मुश्किल
कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती लागत को ग्राहकों पर डालने (Pass-on) की है। हालांकि गर्मी के मौसम में कुछ कंपनियों ने कीमतें बढ़ाई थीं, लेकिन रिटेल मार्केट अभी भी काफी संवेदनशील है। इसके अलावा, अनिश्चित मॉनसून की वजह से ग्रामीण इलाकों से मांग सुस्त है और उत्तर भारत में प्रदूषण संबंधी पाबंदियों के कारण कंस्ट्रक्शन वर्क भी धीमा पड़ गया है। सरप्लस कैपेसिटी होने के कारण कंपनियों में प्राइस वॉर का खतरा भी बना हुआ है, जिससे मार्जिन और गिर सकते हैं।
भविष्य की राह
लंबे समय के लिए देखें तो भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (जैसे रोड, रेल, मेट्रो, डेटा सेंटर) डिमांड को सहारा दे रहे हैं। अब बड़ी सीमेंट कंपनियां मार्जिन बचाने के लिए 'वेस्ट हीट रिकवरी सिस्टम' और 'अल्टरनेटिव फ्यूल' पर जोर दे रही हैं। निवेशकों के लिए अब वॉल्यूम ग्रोथ से ज्यादा महत्वपूर्ण 'EBITDA प्रति टन' और कंपनियों की डेट मैनेजमेंट क्षमता होगी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कंपनियां अपनी कॉस्ट-ऑप्टिमाइजेशन स्ट्रैटेजी के जरिए मार्जिन रिकवरी कैसे करती हैं।
