Cement Industry में क्रांति? कार्बन-फ्री बेसाल्ट से **80%** घटेंगे उत्सर्जन!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Cement Industry में क्रांति? कार्बन-फ्री बेसाल्ट से **80%** घटेंगे उत्सर्जन!
Overview

दुनिया भर की सीमेंट इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी खबर आई है। रिसर्च से पता चला है कि अगर चूना पत्थर (Limestone) की जगह कार्बन-फ्री बेसाल्ट (Basalt) का इस्तेमाल किया जाए, तो सीमेंट बनाने में होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जन को **80%** से भी ज़्यादा कम किया जा सकता है। यह तरीका एनर्जी की खपत को भी **60%** तक घटा सकता है और लागत भी कम कर सकता है, जिससे इंडस्ट्री नेट-ज़ीरो (Net-Zero) लक्ष्यों को हासिल करने के करीब पहुंच सकती है।

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क्यों है सीमेंट इंडस्ट्री बड़ी समस्या?

ग्लोबल कंस्ट्रक्शन के लिए सीमेंट इंडस्ट्री बेहद ज़रूरी है, लेकिन इसका कार्बन फुटप्रिंट (Carbon Footprint) बहुत बड़ा है। सीमेंट बनाने में पारंपरिक तौर पर चूना पत्थर (Limestone) का इस्तेमाल होता है, जिसे जलाने पर भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) निकलती है। यह प्रोसेस दुनिया भर के CO2 उत्सर्जन का करीब 8% हिस्सा है, इसलिए इसे कम करना बहुत ज़रूरी है।

सीमेंट उत्पादन की चुनौती

आम तौर पर, चूना पत्थर को 1,500 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा तापमान पर गर्म किया जाता है। इस केमिकल रिएक्शन से सीधे कैल्शियम कार्बोनेट से CO2 निकलती है। हर टन सीमेंट बनाने पर लगभग 500 किलोग्राम CO2 का उत्सर्जन होता है, जो पर्यावरण के लिए एक बड़ी रुकावट है।

बेसाल्ट: एक हरा-भरा विकल्प

वैज्ञानिकों ने अब कार्बन-फ्री, कैल्शियम से भरपूर सिलिकेट चट्टान, जैसे बेसाल्ट (Basalt) पर स्विच करने का सुझाव दिया है। 'कम्युनिकेशन्स सस्टेनेबिलिटी' (Communications Sustainability) में छपी एक स्टडी के मुताबिक, दुनिया में बेसाल्ट के इतने विशाल भंडार हैं कि मौजूदा तरीकों से सीमेंट उत्पादन को लाखों सालों तक पूरा किया जा सकता है।

उत्सर्जन और एनर्जी की खपत में भारी कटौती

बेसाल्ट कई बड़े फायदे देता है। इस पत्थर से बनी सीमेंट में चूना पत्थर वाली सीमेंट की तुलना में 60% तक कम एनर्जी की ज़रूरत पड़ सकती है। प्रति टन CO2 उत्सर्जन 600 किलोग्राम (चूना पत्थर और नेचुरल गैस के साथ) से घटकर बेसाल्ट के साथ सिर्फ 43-59 किलोग्राम रह सकता है। इस बदलाव से इंडस्ट्री पर पड़ने वाला जलवायु (Climate) का असर बहुत तेज़ी से कम हो सकता है। मौजूदा जीवाश्म ईंधनों (Fossil Fuels) का इस्तेमाल करते हुए भी CO2 उत्सर्जन 25% से ज़्यादा कम हो सकता है।

आर्थिक फायदे और तेज़ अपनाना

रिसर्च में कम एनर्जी खपत से संभावित लागत बचत (Cost Savings) का भी ज़िक्र है। बेसाल्ट चट्टानों में कीमती धातुएं भी हो सकती हैं, जिन्हें उप-उत्पादों (By-products) के तौर पर निकाला जा सकता है। कई नए "ग्रीन सीमेंट" के विपरीत, बेसाल्ट वाले तरीके में मौजूदा टेक्नोलॉजी का ही इस्तेमाल होता है। इससे कंस्ट्रक्शन सेक्टर में इसे तेज़ी से अपनाया जा सकता है, क्योंकि इसमें लंबे डेवलपमेंट और टेस्टिंग पीरियड की ज़रूरत नहीं होगी। फाइनल प्रोडक्ट वही स्टैंडर्ड पोर्टलैंड सीमेंट (Portland Cement) होगा, जो मौजूदा इस्तेमाल के लिए पूरी तरह से ठीक है। स्टडी एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है, जो एक मुख्य ग्लोबल इंडस्ट्री को डीकार्बोनाइज़ (Decarbonise) करने का एक प्रैक्टिकल तरीका पेश करता है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.