कैपिटल गुड्स सेक्टर के लिए दूसरी तिमाही चुनौतीपूर्ण रही है। मार्केट लीडर्स को छोड़ दें, तो बाकी कंपनियों के ऑर्डर इनफ्लो में **10%** की गिरावट आई है। बढ़ती मेटल कीमतों ने मुनाफे पर दबाव बना दिया है, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ गई है।
वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में कैपिटल गुड्स सेक्टर का प्रदर्शन मिला-जुला रहा है। जहां इंडस्ट्री के दिग्गज Larsen & Toubro ने ₹1 लाख करोड़ के शानदार ऑर्डर हासिल किए हैं, वहीं बाकी मार्केट के लिए स्थिति काफी कठिन बनी हुई है। कंपनी के प्रदर्शन को हटा दें, तो सेक्टर के नए ऑर्डर्स में साल-दर-साल 10% की गिरावट देखी गई है।
कमोडिटी महंगाई और मार्जिन पर दबाव
इस तिमाही में इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती इनपुट कॉस्ट का बढ़ना रही है। जिंक, कॉपर, एल्युमिनियम और पिग आयरन जैसी धातुओं की कीमतों में दो अंकों (double digits) की बढ़ोतरी हुई है, जिससे प्रॉफिट मार्जिन पर तगड़ा असर पड़ा है। जिन कंपनियों ने फिक्स्ड-प्राइस कॉन्ट्रैक्ट्स किए हैं, वे अब भारी मुसीबत में हैं। निवेशक अब कंपनियों के मैनेजमेंट की कमेंटरी पर नजर रखे हुए हैं ताकि यह पता चल सके कि क्या उनके पास बढ़ती लागत को ग्राहकों पर डालने की ताकत है या नहीं।
पावर और डिफेंस में मजबूती
बावजूद इसके, कुछ सेक्टर्स में उम्मीद की किरण बाकी है। पावर ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन सेगमेंट का ऑर्डर बुक 120% बढ़कर ₹13,700 करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है। सरकार के ग्रिड आधुनिकीकरण और ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर प्रोजेक्ट्स से इसे बड़ी मदद मिली है। इसी तरह, डिफेंस सेक्टर में भी पिछले साल के मुकाबले ऑर्डर्स में 19% की तेजी दिखी है। हालांकि, नौकरशाही में देरी के कारण प्रोजेक्ट्स के पूरा होने में अभी भी अड़चनें आ रही हैं, जिससे रेवेन्यू आने में देरी हो सकती है।
जियोपॉलिटिकल रिस्क और चुनौतियां
इंटरनेशनल ऑपरेशंस में भी दिक्कतें बढ़ गई हैं। मिडिल ईस्ट में जारी भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical tensions) ने प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने की राह में रोड़े अटका दिए हैं। Cummins और Larsen & Toubro जैसे दिग्गजों ने भी माना है कि इस अस्थिरता का असर प्रोजेक्ट्स की गति पर पड़ रहा है। अब बाजार की नजर ABB India, Siemens और BEML जैसी कंपनियों पर है कि वे बढ़ती महंगाई और इन बाधाओं के बीच अपने मार्जिन को कैसे सुरक्षित रखती हैं और प्रोजेक्ट पाइपलाइन को रेवेन्यू में कैसे बदलती हैं।
