Birla Corporation ने जून तिमाही के लिए अपने नतीजों की घोषणा की है, जिसमें नेट प्रॉफिट में **3.2%** की गिरावट दर्ज की गई है। कंपनी का मुनाफा घटकर **₹115.73 करोड़** रह गया, भले ही रेवेन्यू में **8%** की बढ़त देखी गई। बढ़ी हुई पावर और फ्यूल कॉस्ट के साथ-साथ सीमेंट की कमजोर कीमतों ने कंपनी के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाला है।
Detailed Coverage
मुनाफे पर लागत का भारी बोझ
M.P. Birla Group की प्रमुख कंपनी, Birla Corporation, ने वित्तीय वर्ष 2026 की जून तिमाही में चुनौतीपूर्ण प्रदर्शन किया है। कंपनी ने अपने रेवेन्यू में 7.8% की शानदार बढ़त दर्ज की, जो ₹2,646.45 करोड़ तक पहुंच गया। हालांकि, बढ़ते ऑपरेशनल खर्चों का सीधा असर कंपनी के बॉटम लाइन पर पड़ा। नतीजतन, कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट पिछले साल की समान अवधि के ₹119.57 करोड़ से गिरकर ₹115.73 करोड़ पर आ गया।
सीमेंट डिवीजन के मार्जिन पर दबाव
कंपनी के मुख्य सीमेंट बिजनेस, जिससे सबसे ज्यादा रेवेन्यू आता है, की बिक्री में 7.4% की बढ़त देखी गई और यह ₹2,515.17 करोड़ तक पहुंच गई। सीमेंट की बिक्री वॉल्यूम में 5% का सुधार हुआ, जो 50.5 लाख टन तक पहुंच गया। यह ग्रोथ खासकर महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में देखी गई। लेकिन, वॉल्यूम की यह बढ़त बढ़ती लागतों की भरपाई करने में नाकाम रही। सीमेंट की प्रति टन कीमत में मामूली 2% की ही बढ़ोतरी हुई। वहीं, पावर और फ्यूल के खर्चों में 5% का इजाफा हुआ, जिससे प्रति टन EBITDA में 6% की गिरावट आई और यह ₹675 रह गया। इसके चलते, सीमेंट डिवीजन का EBITDA मार्जिन घटकर 13.6% पर आ गया, जो पिछले साल के मुकाबले 110 बेसिस पॉइंट कम है। मैनेजमेंट का कहना है कि अप्रैल और मई में कीमतों को बढ़ाने के शुरुआती प्रयास सफल नहीं हुए, क्योंकि जून तक कॉम्पिटिटिव प्रेशर के कारण कीमतों में नरमी आ गई थी।
जूट डिवीजन पर इनपुट कॉस्ट का भारी दबाव
कंपनी के छोटे जूट डिवीजन को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। रेवेन्यू में 16.7% की गिरावट आई और यह ₹131.25 करोड़ पर आ गया। कच्चे जूट की रिकॉर्ड तोड़ कीमतों और सप्लाई चेन में आई दिक्कतों के कारण प्रोडक्शन में 27% की भारी गिरावट दर्ज की गई। रेवेन्यू घटने के बावजूद, डोमेस्टिक और इंटरनेशनल सेल्स में ग्रोथ की मदद से यह डिवीजन ₹4.28 करोड़ का कैश प्रॉफिट दर्ज करने में कामयाब रहा।
आगे का नज़रिया और निवेशकों के लिए खास बातें
कंपनी को उम्मीद है कि मॉनसून के मौसम (जो आमतौर पर अगस्त तक रहता है) के दौरान सीमेंट की डिमांड में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं दिखेगी। सितंबर के बाद रिकवरी की उम्मीद है, जो सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और प्राइवेट सेक्टर के कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी से जुड़ी है। हालांकि, लगातार बढ़ती एनर्जी प्राइसेज और इंडस्ट्री में डिमांड से ज्यादा कैपेसिटी को देखते हुए, निवेशक इस बात पर नजर रखेंगे कि क्या कंपनी दिसंबर तिमाही के अंत तक कीमतों में बढ़ोतरी करने में सफल हो पाती है। फ्यूल कॉस्ट को कंट्रोल करने की कंपनी की क्षमता और मुख्य बाजारों में डिमांड की रिकवरी की रफ्तार पर करीबी नजर रखना अहम होगा।
