विस्तार पर Apollo Pipes, पर कहां है दिक्कत?
Apollo Pipes लिमिटेड ने वॉरंट के जरिए जुटाए गए पैसों में से ₹27.50 करोड़ का इस्तेमाल अपने बड़े विस्तार प्रोजेक्ट्स पर किया है। इसमें दादरी (Dadri) में ब्राउनफील्ड एक्सपेंशन और वाराणसी (Varanasi) में ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट शामिल हैं। कंपनी ने बताया कि दादरी प्रोजेक्ट जुलाई 2025 से शुरू हो चुका है, और वाराणसी प्रोजेक्ट मार्च 2026 तक चालू हो जाने की उम्मीद है। फंड का इस्तेमाल कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) और वर्किंग कैपिटल (Working Capital) दोनों के लिए किया गया है।
H1 FY26 के नतीजे और मार्जिन पर क्यों पड़ा असर?
हालांकि, कंपनी के हालिया हाफ-ईयरली फाइनेंशियल ईयर 2026 (H1 FY26) के नतीजे मिले-जुले संकेत दे रहे हैं। इस दौरान कंपनी की टोटल ऑपरेटिंग इनकम (TOI) लगभग ₹511 करोड़ रही, जो पिछले साल की समान अवधि (H1 FY25) के ₹559 करोड़ की तुलना में करीब ~8.6% कम है। इनकम में इस गिरावट के साथ ही ऑपरेटिंग मार्जिन में भी भारी कमी आई है, जो H1 FY26 में गिरकर 7.14% पर आ गया, जबकि H1 FY25 में यह 8.65% था। मैनेजमेंट का कहना है कि प्राइवेट रियल एस्टेट और सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर दोनों में कमजोर मांग और बढ़ती प्रतिस्पर्धा (Competition) की वजह से मार्जिन पर दबाव बढ़ा है।
पिछले पूरे फाइनेंशियल ईयर 2025 (FY25) की बात करें तो TOI लगभग ₹1182 करोड़ थी, जो FY24 के ₹989 करोड़ से ~19.5% ज्यादा थी। इससे पता चलता है कि पिछले साल कंपनी का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा था।
प्रमुख चिंताएं और रेड फ्लैग्स:
CARE रेटिंग्स की रिपोर्ट में एक बड़ी चिंता यह बताई गई है कि ₹110 करोड़ के वॉरंट इश्यू में से ₹82.50 करोड़ की राशि अभी भी वॉरंट अलॉटीज (Allottees) से मिलनी बाकी है। इस्तेमाल किए गए फंड भले ही इश्यू के उद्देश्यों के अनुसार हों, लेकिन इस पेंडिंग राशि का कंपनी की लिक्विडिटी (Liquidity) और प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग पर असर पड़ सकता है।
इससे भी बड़ी बात यह है कि Apollo Pipes के शेयरों का मौजूदा बाजार भाव (CMP) लगभग ₹295 है, जबकि वॉरंट इश्यू प्राइस ₹550 था। इश्यू प्राइस से लगभग 100% कम मौजूदा भाव वॉरंट होल्डर्स के लिए चिंता का विषय बन सकता है। यह उनके लिए कैपिटल की लागत और वॉरंट कन्वर्जन की व्यवहार्यता पर सवाल खड़ा करता है।
आगे क्या देखना होगा?
निवेशक अब बारीकी से नज़र रखेंगे कि कंपनी नए प्रोजेक्ट्स को कितनी जल्दी शुरू कर पाती है और मार्जिन दबाव व प्रतिस्पर्धा को कैसे झेल पाती है। बकाया वॉरंट्स का कन्वर्जन और अलॉटीज से फंड की वसूली भी आने वाले समय में अहम मेट्रिक्स होंगे।