हवाई सफर की रफ्तार धीमी होते ही भारत के बड़े एयरपोर्ट ऑपरेटर्स ने अपनी रणनीति बदल ली है। Adani Airports और GMR Airports अब रिटेल और डाइनिंग जैसे नॉन-एरोनॉटिकल रेवेन्यू पर फोकस बढ़ा रहे हैं ताकि कमाई में स्थिरता बनी रहे।
भारत का प्राइवेट एयरपोर्ट सेक्टर अब बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। हवाई अड्डों को अब सिर्फ एक ट्रांजिट हब के बजाय कमर्शियल शॉपिंग सेंटर्स के रूप में विकसित किया जा रहा है। महामारी के बाद हवाई यात्रा में आई तेजी अब स्थिर हो रही है, जिसे देखते हुए Adani Airports और GMR Airports ने ड्यूटी-फ्री रिटेल, डाइनिंग और प्रीमियम लाउंज जैसे क्षेत्रों में विस्तार की तैयारी तेज कर दी है।
नॉन-एरो रेवेन्यू पर जोर
एयरपोर्ट ऑपरेटर्स के लिए लैंडिंग और पार्किंग फीस जैसी 'एरोनॉटिकल' कमाई सीमित और रेगुलेटेड होती है। इसे संतुलित करने के लिए Adani Airports ने 2030 तक अपने कुल रेवेन्यू में नॉन-एरोनॉटिकल हिस्सेदारी को मौजूदा 56% से बढ़ाकर 70% तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। कंपनी का प्रदर्शन भी मजबूत है, जून 2026 की तिमाही में उनका नॉन-एरो रेवेन्यू सालाना आधार पर 53% बढ़कर ₹2,136 करोड़ पर पहुंच गया है।
दूसरी ओर, GMR Airports अपने कमर्शियल प्लेटफॉर्म से 15% सालाना ग्रोथ का लक्ष्य लेकर चल रही है। कंपनी के प्रति यात्री नॉन-एरो यिल्ड (yield) ₹691 पर पहुंच गई है। साथ ही, कंपनी अगले 5 से 7 वर्षों में दिल्ली और हैदराबाद के प्रोजेक्ट्स में लगभग ₹194 अरब का भारी निवेश करने की योजना बना रही है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
यह रणनीति कमाई में स्थिरता तो ला सकती है, लेकिन इसके साथ बड़े जोखिम भी जुड़े हैं। इतने बड़े पैमाने पर हो रहे इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के कारण कर्ज (debt) और कैश फ्लो पर दबाव बढ़ सकता है। निवेशकों को ध्यान देना होगा कि क्या एयरपोर्ट्स का 'कन्वर्जन रेट' यानी खरीदारी करने वाले यात्रियों की संख्या उम्मीद के मुताबिक बढ़ती है या नहीं।
यदि इकोनॉमिक स्लोडाउन के चलते लोगों ने खर्च कम किया या पैसेंजर ग्रोथ ठहरी रही, तो इन भारी निवेशों से रिटर्न मिलने में देरी हो सकती है। फिलहाल, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये रिटेल निवेश इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी लागत को कवर करने में सक्षम होंगे।
