AI से MSMEs के लिए वैल्यू का बड़ा मौका
Artificial intelligence (AI) भारतीय मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) सेक्टर की सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए जबरदस्त वैल्यू (Value) पैदा करने की कगार पर है। PwC India और Observer Research Foundation (ORF) की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर MSMEs भारत के कुल मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू एडेड (GVA) का 50% बनाते हैं, तो AI 2035 तक $135.6 बिलियन से $149.9 बिलियन तक का योगदान दे सकता है।
AI टेक्नोलॉजीज जैसे प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस (Predictive Maintenance), क्वालिटी कंट्रोल (Quality Control), AI-बेस्ड क्रेडिट असेसमेंट (AI-driven credit assessment) और जेनरेटिव डिज़ाइन (Generative Design) से एफिशिएंसी (Efficiency), प्रोडक्ट क्वालिटी (Product Quality) और ग्लोबल कंपीटिटिवनेस (Global Competitiveness) में बड़े सुधार की उम्मीद है।
इस बीच, Nifty India Manufacturing Index ने पिछले 1 साल में करीब 23.8% का शानदार रिटर्न दिया है। हालांकि, इसका मौजूदा P/E रेश्यो (Price-to-Earnings Ratio) करीब 28.2 है, जो इसके ऐतिहासिक औसत से थोड़ा ज्यादा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को प्रीमियम वैल्यूएशन मिल रहा है।
NITI Aayog का मानना है कि AI 2035 तक भारत की GDP में $500-$600 बिलियन का महत्वपूर्ण योगदान कर सकता है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और स्किल की खाई को पाटना
MSMEs में AI को अपनाने की उम्मीदों को कुछ गंभीर संरचनात्मक चुनौतियों से झटका लग रहा है। सबसे बड़ी बाधा AI इंफ्रास्ट्रक्चर में लगने वाले अनुमानित $500 बिलियन के भारी-भरकम निवेश की है।
इसके अलावा, MSMEs को टेक्नोलॉजी की भारी शुरुआती लागत, सस्ते फाइनेंस की कमी, डिजिटल लिटरेसी (Digital Literacy) का निम्न स्तर और AI स्किल्ड प्रोफेशनल्स (AI-skilled professionals) की भारी कमी से भी जूझना पड़ रहा है।
2025 की एक Zoho सर्वे के अनुसार, 60% MSMEs 2030 तक AI अपनाने की योजना बना रहे हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर स्किल की कमी और जागरूकता की कमी को प्रमुख बाधा मानते हैं।
यह असमानता यह दर्शाती है कि AI का फायदा शायद सिर्फ बड़े और ज्यादा रिसोर्स वाले MSMEs को ही मिल पाएगा, जिससे इंडस्ट्री के प्लेयर्स के बीच की खाई और चौड़ी हो सकती है।
वर्तमान में, भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर GDP का करीब 12.53% योगदान देता है, जबकि सरकार का लक्ष्य 2047 तक इसे 25% तक ले जाना है। यह दिखाता है कि इन बुनियादी बाधाओं को दूर करना कितना ज़रूरी है।
ग्लोबल परिप्रेक्ष्य और भारत की हकीकत
वैश्विक स्तर पर, AI इन मैन्युफैक्चरिंग (AI in Manufacturing) के बाजार में North America का दबदबा है, जिसमें Germany और China भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। Asia-Pacific सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाला बाजार बनकर उभर रहा है।
भारत, भू-राजनीतिक बदलावों के बीच एक ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई-चेन पार्टनर बनने की कोशिश में है, लेकिन AI को असमान रूप से अपनाने की चुनौती का सामना कर रहा है।
स्टडीज बताती हैं कि टेक-एनेबल्ड (Tech-enabled) MSMEs AI की क्षमता को समझते हैं, पर इसका असल इम्प्लीमेंटेशन (Implementation) अभी भी बिखरा हुआ है।
इस असमानता का मतलब है कि 'MANAV' विजन जैसे सरकारी निर्देशों का पालन महत्वपूर्ण है, लेकिन फैक्ट्री फ्लोर पर इनके प्रैक्टिकल एप्लीकेशन (Practical Application) के लिए लागत-प्रभावी (Cost-effective) और भाषाई रूप से अनुकूलित (Linguistically adaptable) समाधानों की ज़रूरत है।
स्टार्टअप्स (Startups) को भारत की वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए AI प्रोडक्ट्स बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, खासकर ऐसे जो लागत-प्रभावी (Cost-efficient) और बहुभाषी (Multilingual) हों ताकि वे विभिन्न MSMEs की जरूरतों को पूरा कर सकें।
संभावित खतरे (The Bear Case)
मैन्युफैक्चरिंग MSMEs में AI को लेकर जो उम्मीदें जताई जा रही हैं, उन्हें संभावित खतरों के नजरिए से भी देखना ज़रूरी है।
इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े निवेश की ज़रूरत एक बहुत बड़ी बाधा पेश करती है। अगर यह गैप (Gap) पूरा नहीं हुआ, तो 2035 तक मैन्युफैक्चरिंग में AI का अनुमानित $85-$100 बिलियन का योगदान शायद ही हासिल हो पाए।
हालांकि AI को अक्सर 'जॉब एनहांसर' (Job Enhancer) कहा जाता है, लेकिन रूटीन और कम-स्किल वाली नौकरियों के खत्म होने की चिंताएं बनी हुई हैं। इसके लिए खास सेक्टर-स्पेसिफिक (Sector-specific) रणनीतियों और वर्कफोर्स अपस्किलिंग (Workforce upskilling) की ज़रूरत है।
AI को सफलतापूर्वक अपनाने के लिए टॉप मैनेजमेंट का सपोर्ट, कर्मचारियों के विरोध पर काबू पाना और निरंतरता बनाए रखना जैसे कारक महत्वपूर्ण हैं—ये ऐसी चीजें हैं जिनकी अक्सर छोटे और सीमित संसाधनों वाले उद्यमों में कमी होती है।
Nifty India Manufacturing Index का मौजूदा P/E करीब 28.2 है, जो यह दर्शाता है कि निवेशक पहले से ही काफी ग्रोथ की उम्मीद कर रहे हैं। अगर AI को अपनाने की प्रक्रिया धीमी रही, तो यह उम्मीदें पूरी नहीं हो पाएंगी।
भविष्य का नज़रिया
इन चुनौतियों के बावजूद, भारत के मैन्युफैक्चरिंग MSMEs देश के विकसित अर्थव्यवस्था (Developed Economy) बनने और ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के बड़े लक्ष्य में अहम भूमिका निभाते हैं।
सरकार के इंडिया AI मिशन (India AI Mission) और 'Advancing AI Readiness and Adoption in Manufacturing MSMEs' जैसे अध्ययनों से AI को अपनाने को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता जाहिर होती है।
2047 तक $3.13-$3.21 ट्रिलियन की ग्रोथ के अवसरों को भुनाने के लिए, जिसके लिए MSMEs को अपनी मैन्युफैक्चरिंग GVA शेयर 50% तक बढ़ाना होगा और मैन्युफैक्चरिंग को GDP में 25% का योगदान देना होगा, AI को अपनाने की खाई को पाटने के लिए रणनीतिक हस्तक्षेप (Strategic interventions) ज़रूरी हैं।
अब फोकस केवल इरादों से हटकर एग्जीक्यूशन (Execution) पर होना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि AI का डिप्लॉयमेंट (Deployment) समावेशी (Inclusive), सस्ता हो और सीधे तौर पर फैक्ट्री फ्लोर पर मापन योग्य प्रोडक्टिविटी लाभ (Measurable productivity gains) में तब्दील हो।