शुरुआती दौर की लीडर
आज जब Ozempic और Mounjaro जैसी Obestity की दवाओं ने दुनिया भर में धूम मचा रखी है, Zydus Lifesciences के वैज्ञानिकों ने 15 साल पहले ही, यानी 2010 में, ZYOG1 नाम की एक ओरल Glucagon-like peptide-1 (GLP-1) agonist दवा पर बड़ी कामयाबी हासिल कर ली थी। उस समय नाजुक पेप्टाइड-आधारित दवाओं को ओरली डिलीवर करना एक बड़ी साइंटिफिक चुनौती थी। ZYOG1 ने ब्लड शुगर और HbA1c कम करने के साथ-साथ वजन घटाने में भी अच्छे प्री-क्लिनिकल फायदे दिखाए, और साइड इफेक्ट्स (जैसे मतली) भी कम थे। Zydus Cadila (तब का नाम) को जून 2010 में भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल से Phase I क्लिनिकल ट्रायल की मंजूरी मिल गई थी, जो डायबिटिज जैसी बीमारियों के लिए भारतीय फार्मा इनोवेशन में एक अहम कदम हो सकता था।
विकास की राह में रोड़े
हालांकि, साइंटिफिक दमदारी और GLP-1 रिसर्च के एक्सपर्ट Richard DiMarchi जैसे लोगों की सराहना के बावजूद, Zydus ने ZYOG1 के क्लिनिकल डेवलपमेंट को बीच में ही रोक दिया। इसका मुख्य कारण ग्लोबल क्लिनिकल ट्रायल का भारी-भरकम खर्च था, खासकर US FDA जैसी रेगुलेटरी बॉडीज के सख्त सुरक्षा नियमों को पूरा करने की लागत। उस समय Obestity को आज की तरह बड़ा मार्केट अवसर नहीं माना जा रहा था। कंपनी के एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि ZYOG1 सफल हो सकती थी, लेकिन प्री-क्लिनिकल नतीजे ही सब कुछ नहीं होते। बड़े पैमाने पर ह्यूमन ट्रायल का खर्च और Obestity मार्केट की क्षमता को लेकर तब कम जानकारी होने के कारण आगे निवेश नहीं किया गया, जो उस समय कई कंपनियों के लिए आम बात थी।
बदलता हुआ GLP-1 का परिदृश्य
Zydus के शुरुआती प्रयासों की तुलना आज के GLP-1 मार्केट से करें तो यह एक बड़ा अंतर दिखाता है। यह मार्केट 2026 तक $58 अरब और 2035 तक $132 अरब से भी ज्यादा का होने का अनुमान है। साइंटिफिक और फाइनेंशियल परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। Novo Nordisk ने ओरल पेप्टाइड डिलीवरी की जटिलताओं को पार करते हुए 2019 में Rybelsus लॉन्च किया। Eli Lilly की Mounjaro और Zepbound ने इस मार्केट में तहलका मचा दिया है, जिसमें semaglutide और tirzepatide का दबदबा है। कॉम्पिटिशन इतना कड़ा है कि Pfizer ने Late 2025 में Metsera को $10 अरब में खरीदा ताकि Obestity पाइपलाइन को मजबूत किया जा सके। भारत में भी Sun Pharma जैसी कंपनियां Utreglutide (GL0034) जैसी नई Obestity दवाओं पर काम कर रही हैं। यह पिछले डेढ़ दशक में GLP-1 थेरेपी को लेकर मार्केट की सोच और उसकी फाइनेंशियल फिजिबिलिटी में आए भारी बदलाव को दर्शाता है।
नजरिए से देखें तो: सोच-समझकर लिया फैसला या चूकी हुई बड़ी बाजी?
एक हेज फंड के नजरिए से देखें तो 2010 में Zydus का ZYOG1 को छोड़ने का फैसला, फाइनेंशियल व्यावहारिकता और दूरदर्शिता के बीच का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। 2000s और 2010s की शुरुआत में ग्लोबल क्लिनिकल ट्रायल के भारी R&D खर्च और उस समय छोटे Obestity मार्केट को देखते हुए, आगे निवेश करना एक बड़ा जुआ था। Novo Nordisk (P/E ~10.4x) और Eli Lilly (P/E ~44.0x) जैसे दिग्गजों के विपरीत, Zydus, जिसका P/E रेशियो लगभग 18-22x था, शायद ज्यादा कैपिटल की कमी से जूझ रहा था। भले ही कंपनी की क्वालिटी 'Excellent' ग्रेड की हो, लेकिन हालिया 'Sell' रेटिंग (MarketsMOJO द्वारा) जो फाइनेंशियल हेल्थ में गिरावट और घटते Mojo Score का हवाला देती है, सतर्क रहने की सलाह देती है। कंपनी का ROCE, 20.07% पर ठीकठाक होने के बावजूद, हाल के समय में सबसे कम बताया गया है। प्रतिस्पर्धियों जैसे Pfizer द्वारा Obestity एसेट्स में $10 अरब का भारी निवेश यह दिखाता है कि आज इन्हें कितना महत्व दिया जा रहा है। इससे पता चलता है कि Zydus की शुरुआती दूरदर्शिता रणनीतिक रूप से सही रही होगी, लेकिन स्वतंत्र विकास के लिए आर्थिक रूप से समय सही नहीं था।
भविष्य की राह: मेटाबोलिक फ्रंटियर पर नेविगेट करना
Zydus Lifesciences के लिए विश्लेषकों की राय मिली-जुली है, जो 'Neutral' से 'Moderate Buy' तक है। औसत 12-महीने के प्राइस टारगेट 991-1015 INR के आसपास हैं। कंपनी के पास अपनी शुरुआती GLP-1 रिसर्च से मिले बुनियादी ज्ञान का भंडार है, लेकिन तेजी से बढ़ते मेटाबोलिक डिजीज सेक्टर में उसकी वर्तमान पाइपलाइन साथियों की तुलना में कम प्रमुख है। GLP-1 और Obestity ड्रग मार्केट अपनी विस्फोटक रफ्तार जारी रखे हुए है, जो अवसर और चुनौतियां दोनों पेश कर रहा है। इस क्षेत्र में Zydus की भविष्य की सफलता, शायद नई दवाओं को रणनीतिक रूप से हासिल करने या विकसित करने की उसकी क्षमता पर निर्भर करेगी, ताकि विज्ञान की ऐतिहासिक समझ का फायदा उठाया जा सके और फार्मा इनोवेशन की नाटकीय रूप से बदली हुई आर्थिक और रेगुलेटरी वास्तविकताओं के साथ तालमेल बिठाया जा सके।