ग्रोथ पर बड़ा दांव, पर घाटे की चिंता
Zota Health Care ने हाल ही में क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP) के जरिए ₹350 करोड़ की भारी रकम जुटाई है। इस फंड जुटाने की प्रक्रिया के बाद फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर (FII) की हिस्सेदारी बढ़कर 8.1% और डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर (DII) की हिस्सेदारी 7.2% हो गई है। यह दिखाता है कि बड़े निवेशक कंपनी की भविष्य की ग्रोथ स्टोरी पर भरोसा कर रहे हैं, खासकर उसके DAVAINDIA जेनेरिक फार्मेसी नेटवर्क के विस्तार को लेकर।
DAVAINDIA का बढ़ता दबदबा
Zota Health Care की कमाई का 74% हिस्सा अब उसके DAVAINDIA जेनेरिक फार्मेसी नेटवर्क से आ रहा है। 2017 में लॉन्च किया गया यह मॉडल पारंपरिक बिचौलियों को हटाकर जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 30% से 90% तक डिस्काउंट पर उपलब्ध कराता है। कंपनी अपने नेटवर्क को तेजी से बढ़ा रही है, तीसरी तिमाही (Q3FY26) में ही 276 नए स्टोर खोले गए, जिससे कुल स्टोर की संख्या बढ़कर 2,331 हो गई है। कंपनी का लक्ष्य मार्च 2029 तक 5,000 से ज्यादा स्टोर खोलने का है। यह विस्तार भारत में बढ़ती पुरानी बीमारियों (क्रॉनिक डिजीज) जैसे डायबिटीज, हार्ट डिजीज और कैंसर के मरीजों की बड़ी संख्या को देखते हुए महत्वपूर्ण है।
सेल्स बढ़ी, पर घाटा भी उछला
तीसरी तिमाही (Q3FY26) में Zota Health Care ने सेल्स में 98% की जोरदार बढ़ोतरी दर्ज की और यह ₹143 करोड़ पर पहुंच गई। हालांकि, इस टॉप-लाइन ग्रोथ के बावजूद, कंपनी का नेट लॉस (घाटा) भी ₹19 करोड़ (Q3FY25) से बढ़कर ₹30 करोड़ (Q3FY26) हो गया है। यह दिखाता है कि आक्रामक विस्तार और नए स्टोर खोलने की लागत कंपनी के मुनाफे पर भारी पड़ रही है। कंपनी का कंसोलिडेटेड EBITDA (ब्याज, टैक्स, डेप्रिसिएशन और एमोर्टाइजेशन से पहले की कमाई) भी इस तिमाही में मामूली ₹1.28 करोड़ रहा, जो स्टोर विस्तार से जुड़े खर्चों से प्रभावित हुआ।
वैल्यूएशन और निवेशकों का भरोसा
कंपनी का मार्केट कैप फिलहाल करीब ₹40.7 बिलियन है और इसका प्राइस-टू-बुक (P/B) रेश्यो लगभग 13.78 है। यह दर्शाता है कि निवेशक कंपनी की मौजूदा कमाई के बजाय भविष्य की ग्रोथ पर दांव लगा रहे हैं। FIIs और DIIs द्वारा हिस्सेदारी बढ़ाना इस बात का संकेत है कि वे Zota Health के लंबे समय के विजन पर विश्वास करते हैं, भले ही कंपनी फिलहाल भारी घाटे से जूझ रही हो।
आगे की राह: ग्रोथ या प्रॉफिट?
Zota Health Care एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। DAVAINDIA मॉडल में भारत के फार्मेसी रिटेल बाजार को बदलने की क्षमता है, जो कि सस्ती और सुलभ दवाओं पर केंद्रित है। जुटाए गए फंड से कंपनी को विस्तार के लिए और समय मिलेगा। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सेल्स की इस जबरदस्त ग्रोथ को स्थायी मुनाफे में कैसे बदला जाए। कंपनी को अपनी ऑपरेशनल लागतों को नियंत्रित करने, स्टोर-लेवल इकोनॉमिक्स (दुकानों की लाभप्रदता) को बेहतर बनाने और कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच अपने घाटे को कम करने पर ध्यान देना होगा, ताकि संस्थागत निवेशकों द्वारा दिखाए गए भरोसे को सही साबित किया जा सके।