हेल्थकेयर में AI का बोलबाला है, पर कई टूल्स डॉक्टर्स की असली ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे। ये सिर्फ डेटा पर फोकस करते हैं, न कि बीमारियों पर। पर Qure.ai जैसे कुछ टूल्स साबित करते हैं कि कैसे खास समस्याओं को सुलझाकर कामयाबी पाई जा सकती है।
Detailed Coverage
हेल्थकेयर में AI की बड़ी दिक्कत
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का हेल्थकेयर में तेज़ी से इस्तेमाल बढ़ रहा है और कई नए डायग्नोस्टिक टूल्स बाज़ार में आ रहे हैं। लेकिन, हकीकत में डॉक्टर्स को इन टूल्स से उतनी मदद नहीं मिल पा रही जितनी उम्मीद थी। कई बार ऐसा होता है कि AI टूल्स डेवलप करने वाले अपनी सुविधा के हिसाब से उपलब्ध डेटा पर ज़्यादा ध्यान देते हैं, बजाय इसके कि डॉक्टर्स को रोज़ाना किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। नतीजा ये होता है कि भले ही ये AI मॉडल तकनीकी रूप से बहुत एडवांस हों, पर ये मेडिकल प्रोफेशनल्स के रोज़मर्रा के काम का बोझ कम नहीं कर पाते।
रेडियोलॉजी और डायग्नोस्टिक्स में गैप
रेडियोलॉजी इसका एक बड़ा उदाहरण है। इस फील्ड में ज़्यादातर AI टूल्स 'सेगमेंटेशन' के लिए बनाए जाते हैं - यानी मेडिकल स्कैन में ऑर्गन्स या ट्यूमर को मार्क करना। AI इन कामों में भले ही सटीक हो, लेकिन बिज़ी रेडियोलॉजिस्ट को इससे उनके काम की रफ़्तार बढ़ाने में ज़्यादा मदद नहीं मिलती। उनकी सबसे बड़ी ज़रूरत है 'ट्राइएज' (Triage) की, खासकर ऐसी जगहों पर जहां रिसोर्स कम हैं। रेडियोलॉजिस्ट को ऐसे टूल्स चाहिए जो सैकड़ों इमेजेस में से सबसे ज़रूरी और गंभीर मामलों को तुरंत पहचान सकें, ताकि जानलेवा बीमारियों का पता जल्दी लगाया जा सके। डेवलपर्स अक्सर इस तरफ कम ध्यान देते हैं क्योंकि यह तकनीकी रूप से ज़्यादा मुश्किल है और इसमें गलती की गुंजाइश ज़्यादा होने पर बड़े खतरे हो सकते हैं।
खास समाधानों की सफलता
जब AI को क्लीनिकल वर्कफ्लो को ध्यान में रखकर बनाया जाता है, तो इसका असर काफी बड़ा हो सकता है। मिसाल के तौर पर, भारतीय स्टार्टअप Qure.ai ने अपने चेस्ट एक्स-रे टूल से पहचान बनाई है, जो टीबी (Tuberculosis) की स्क्रीनिंग में मदद करता है। एक खास और ज़रूरी ज़रूरत पर फोकस करके, इस टूल ने जिन जगहों पर इसे इस्तेमाल किया गया, वहां टीबी के मामलों का पता लगाने में 15% की बढ़ोतरी की। एक और सफल समाधान है 'एंबिएंट स्क्राइब' (Ambient Scribe) टेक्नोलॉजी, जो पेशेंट से बात करते समय अपने आप क्लीनिकल नोट्स तैयार कर लेती है। यह डॉक्यूमेंटेशन का बोझ कम करती है, जो डॉक्टर का काफी समय ले लेता है। इससे हॉस्पिटल की प्रोडक्टिविटी में बड़ा फायदा हुआ है, जैसे The Permanente Medical Group ने एक साल में 16,000 डॉक्टर घंटों की बचत की।
लागू करने और इक्विटी की चुनौतियां
उपयोगिता के अलावा, संदर्भ (Context) का मुद्दा भी है। जो AI मॉडल टेस्ट में अच्छा प्रदर्शन करते हैं, वे असल हॉस्पिटल के माहौल में संघर्ष कर सकते हैं। इसके अलावा, डेवलपर्स कभी-कभी स्थानीय स्वास्थ्य जनसांख्यिकी (Demographics) पर विचार नहीं करते। उदाहरण के लिए, मेलानोमा का पता लगाने के लिए विकसित किए गए AI टूल्स गहरे रंग की त्वचा वाले मरीज़ों में स्किन कंडीशन की सटीक पहचान करने में संघर्ष कर सकते हैं, जिससे भारत जैसे क्षेत्रों में उनकी प्रभावशीलता सीमित हो जाती है। इसी तरह, अलग-अलग हेल्थकेयर सिस्टम के लिए डिज़ाइन किए गए मॉडल अत्यधिक फॉल्स अलार्म (False Alarms) उत्पन्न कर सकते हैं, जो स्टाफ की मदद करने के बजाय उन्हें और ज़्यादा परेशान कर सकते हैं।
भविष्य में, हेल्थकेयर में AI की सफलता शायद डेवलपमेंट प्रक्रिया को फिर से व्यवस्थित करने पर निर्भर करेगी। टेक्नोलॉजिकल संभावनाओं से शुरुआत करने के बजाय, डेवलपर्स को सीधे प्रैक्टिशनर्स से सलाह लेकर सबसे महत्वपूर्ण समस्याओं की पहचान करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स और निवेशकों के लिए, मुख्य बात यह देखनी होगी कि कोई समाधान केयर डिलीवरी में किसी खास, मापने योग्य बाधा को दूर कर रहा है या नहीं, जैसे डॉक्यूमेंटेशन का समय या स्क्रीनिंग की एफिशिएंसी, न कि सिर्फ एक सामान्य AI-पावर्ड डायग्नोस्टिक फीचर पेश कर रहा है।
