पश्चिम बंगाल में सरकारी मेडिकल कॉलेज के शिक्षकों (Teacher-Doctors) के लिए एक बड़ा नियम लागू किया गया है। स्वास्थ्य विभाग ने आदेश जारी किया है कि अब ये डॉक्टर मरीज के भर्ती होने के दिन और उसके अगले 48 घंटे तक, यानी कुल 72 घंटे तक कोई भी प्राइवेट प्रैक्टिस (Private Practice) नहीं कर पाएंगे। यह नियम 24 अगस्त 2026 से लागू होगा।
क्या है नया नियम?
पश्चिम बंगाल स्वास्थ्य विभाग ने मेडिकल एजुकेशन सर्विस से जुड़े सरकारी डॉक्टरों के लिए यह नया फरमान जारी किया है। अब से, जब कोई मरीज़ सरकारी अस्पताल में भर्ती होगा, तो उस डॉक्टर को, जिसके अंडर वो मरीज़ है, उस दिन से लेकर अगले 48 घंटों तक, यानी कुल 72 घंटे तक अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस रोकनी होगी। इस दौरान डॉक्टरों को सिर्फ सरकारी अस्पतालों में मरीजों की देखभाल पर ही ध्यान देना होगा।
नियम का मकसद क्या है?
इस कदम का मुख्य मकसद सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भर्ती मरीजों को लगातार और बेहतर इलाज मुहैया कराना है। सरकार का मानना है कि इससे यह सुनिश्चित होगा कि डॉक्टर अपनी पूरी क्षमता से सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान दें और मरीजों की देखभाल में कोई कोताही न बरती जाए। यह नियम डॉक्टरों पर काम के दोहरे बोझ को कम करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने के इरादे से लाया गया है।
निजी अस्पतालों पर क्या होगा असर?
पश्चिम बंगाल के कई प्राइवेट अस्पताल और क्लिनिक सरकारी मेडिकल कॉलेज के सीनियर डॉक्टरों की सेवाओं पर निर्भर रहते हैं। वे इन डॉक्टरों को विजिटिंग कंसल्टेंट के तौर पर बुलाते हैं। इस नए नियम से उनकी वर्किंग शेड्यूलिंग में बदलाव आ सकता है। जिन मरीजों का इलाज इन डॉक्टरों से निजी तौर पर चल रहा है, उन्हें अपॉइंटमेंट मिलने में दिक्कत हो सकती है, खासकर जिन्हें रेगुलर फॉलो-अप की जरूरत होती है।
डॉक्टरों और मरीज़ों की मिली-जुली प्रतिक्रिया
हालांकि सरकार का इरादा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना है, लेकिन इस फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रिया आ रही है। कुछ मेडिकल प्रोफेशनल्स ने चिंता जताई है कि इससे निजी संस्थानों में इलाज करा रहे मरीजों को परेशानी हो सकती है और उनके अपने प्रोफेशनल शेड्यूल पर भी असर पड़ेगा। वहीं, कुछ का मानना है कि यह सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की जवाबदेही तय करने के लिए एक जरूरी कदम है।
स्वास्थ्य क्षेत्र पर नजर रखने वालों के लिए यह नियम एक महत्वपूर्ण डेवलपमेंट है। यह दिखाता है कि सरकारी कर्मचारियों द्वारा निजी सेवाएं देने के नियमों पर रेगुलेटरी रिस्क बना रहता है। अब यह देखना अहम होगा कि प्राइवेट क्लिनिक और अस्पताल इन नई समय-सीमाओं के साथ कैसे तालमेल बिठाते हैं और क्या इस नीति से सरकारी अस्पतालों में मरीजों के नतीजों में कोई सुधार आता है।
