University of Hyderabad के रिसर्चर्स ने मेडिकल इंप्लांट्स को और अधिक टिकाऊ बनाने के लिए एक नई टाइटेनियम-कोबाल्ट-क्रोमियम अलॉय (Alloy) विकसित की है। यह आविष्कार मानव हड्डियों की प्राकृतिक लचीलेपन की नकल करता है, जिससे भविष्य में बार-बार होने वाली सर्जरी की जरूरत कम हो सकती है।
हड्डियों की समस्या का नया समाधान
University of Hyderabad की टीम ने IIT Delhi, IIT Bhubaneswar और CSIR-CECRI के साथ मिलकर एक नई कैटेगरी के मटेरियल 'मल्टी-प्रिंसिपल एलिमेंट अलॉयज' (MPEAs) पर काम किया है। मौजूदा ऑर्थोपेडिक इंप्लांट्स के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे मानव शरीर के केमिकल वातावरण में लंबे समय तक टिक नहीं पाते। शरीर के अंदर ये इंप्लांट्स समय के साथ गलने (corrosion) लगते हैं या फिर इनकी स्टिफनेस (stiffness) प्राकृतिक हड्डियों से कहीं अधिक होती है, जिससे हड्डियाँ कमजोर होने लगती हैं और इंप्लांट्स ढीले पड़ जाते हैं।
कैसे काम करती है यह नई तकनीक?
रिसर्चर्स ने टाइटेनियम, कोबाल्ट और क्रोमियम का एक खास मिश्रण तैयार किया है। इस अलॉय की खासियत यह है कि इसमें न के बराबर अंतर के साथ तत्वों का उपयोग किया गया है, जो इसे अत्यधिक टिकाऊ बनाता है। इसकी मैकेनिकल स्टिफनेस बिल्कुल मानव हड्डियों जैसी है, जो 'स्ट्रेस शील्डिंग' के प्रभाव को कम करने में मदद करेगी। इससे इंप्लांट्स के शरीर से अलग होने का खतरा काफी हद तक कम हो जाएगा।
कमर्शियल भविष्य और चुनौतियां
'Advanced Healthcare Materials' जर्नल में प्रकाशित यह स्टडी अभी शुरुआती स्तर पर है। हालांकि यह मटेरियल साइंस में एक बड़ा कदम है, लेकिन इसे बाजार में आने के लिए लंबा रास्ता तय करना होगा। मेडिकल डिवाइस सेक्टर के जानकारों का मानना है कि इसके बाद लंबे समय तक चलने वाले क्लीनिकल ट्रायल्स और सख्त रेगुलेटरी अप्रूवल्स की प्रक्रिया से गुजरना होगा। अभी यह तकनीक रिसर्च एंड डेवलपमेंट के फेज में है, लेकिन भविष्य में यह मेडिकल टेक्नोलॉजी के मानकों को पूरी तरह बदल सकती है।
