Torrent Pharma, Eris Lifesciences की बल्ले-बल्ले! भारत में जेनेरिक GLP-1 मार्केट में तूफानी तेजी

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Torrent Pharma, Eris Lifesciences की बल्ले-बल्ले! भारत में जेनेरिक GLP-1 मार्केट में तूफानी तेजी

Semaglutide के पेटेंट (Patent) की समाप्ति मार्च 2026 में होगी, लेकिन भारतीय फार्मा कंपनियों ने अभी से कमर कस ली है। **20 से ज्यादा** कंपनियों ने जेनेरिक वर्जन लॉन्च कर दिए हैं, जिससे डायबिटीज और मोटापे के इलाज का खर्च तेजी से कम हो रहा है। यह भारतीय दवा निर्माताओं के लिए एक अरब डॉलर के बाजार का अवसर पैदा कर रहा है।

भारत के जेनेरिक GLP-1 बाजार में बड़ा बदलाव

Semaglutide का मुख्य पेटेंट (Patent) 20 मार्च 2026 को खत्म हो रहा है, लेकिन इसका असर अभी से भारतीय मेटाबोलिक हेल्थकेयर बाजार में दिखने लगा है। देश की फार्मा कंपनियां GLP-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट के सस्ते जेनेरिक वर्जन तेजी से बाजार में उतार रही हैं। ये दवाएं टाइप 2 डायबिटीज, मोटापे और संबंधित मेटाबोलिक बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होती हैं। इस कदम से मरीजों के लिए ये एडवांस थेरेपी अब काफी सस्ती हो गई है, जो कि ओरिजिनल दवाओं के मुकाबले काफी कम है।

कॉम्पिटिशन और मार्केट शेयर

नए आंकड़ों के मुताबिक, Torrent Pharmaceuticals ने जेनेरिक Semaglutide बाजार में अच्छी शुरुआत की है और लगभग 38% मार्केट शेयर पर कब्जा कर लिया है। Eris Lifesciences भी पीछे नहीं है, जिसने पेटेंट एक्सपायरी के बाद पहले तिमाही में वॉल्यूम के हिसाब से 22% और वैल्यू के हिसाब से 13% से 14% मार्केट शेयर हासिल किया है। 20 से ज्यादा कंपनियों के उतरने से कॉम्पिटिशन काफी बढ़ गया है, जिससे इन दवाओं की खुदरा कीमतों में भारी कमी आई है।

फाइनेंशियल इंपैक्ट और मार्केट साइज

फिलहाल, भारत में जेनेरिक Semaglutide की मंथली बिक्री करीब ₹30 करोड़ है, जो सालाना ₹360 करोड़ के आंकड़े तक पहुंच जाती है। अगर GLP-1 थेरेपी के पूरे बाजार को देखें, जिसमें tirzepatide जैसी अन्य दवाएं भी शामिल हैं, तो भारत में इसका सालाना बाजार ₹1,906 करोड़ का अनुमान है। इंडस्ट्री का अनुमान है कि अगले कुछ सालों में यह सेगमेंट 1 अरब डॉलर (करीब ₹8,300 करोड़) के पार जा सकता है, क्योंकि डायबिटीज और वजन घटाने के लिए इन दवाओं के बारे में जागरूकता बढ़ रही है।

मैन्युफैक्चरिंग और ऑपरेशनल चुनौतियां

इंजेक्टेबल GLP-1 थेरेपी का मैन्युफैक्चरिंग पारंपरिक ओरल दवाओं की तुलना में तकनीकी रूप से काफी जटिल है। यह जटिलता नई कंपनियों के लिए बाजार में प्रवेश करना मुश्किल बनाती है और मार्केट को एडवांस इंफ्रास्ट्रक्चर वाली कंपनियों के पक्ष में समेकित करती है। Eris Lifesciences जैसी कंपनियां मुनाफा बनाए रखने और सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए बैकवर्ड इंटीग्रेशन (Backward Integration) में निवेश कर रही हैं। इसमें सिंथेटिक Semaglutide और रीकॉम्बिनेंट टेक्नोलॉजी (Recombinant Technology) जैसी इन-हाउस क्षमताएं विकसित करना शामिल है, जो प्रोडक्शन बढ़ाने और लंबे समय में लागत को कंट्रोल करने में मदद करता है।

क्लिनिकल और रेगुलेटरी पहलू

बाजार में बड़ी अवसर होने के बावजूद, ये दवाएं सिर्फ लक्षणों का इलाज करने के बजाय बीमारी के रास्ते को बदलने वाली शक्तिशाली क्लिनिकल एजेंट हैं। इन्हें फिलहाल इंसुलिन जैसे पारंपरिक उपचारों के पूरक के रूप में देखा जा रहा है, न कि सीधे विकल्प के तौर पर। जैसे-जैसे इन थेरेपी की मांग बढ़ेगी, निवेशकों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कंपनियां प्राइसिंग वॉर के बीच मैन्युफैक्चरिंग मार्जिन को कैसे मैनेज करती हैं। लगातार सफलता के लिए कंपनियों को हाई क्वालिटी-कंट्रोल स्टैंडर्ड बनाए रखने, क्लिनिकल अप्रूवल हासिल करने और जटिल इंजेक्टेबल मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी लागतों को मैनेज करने की क्षमता पर निर्भर रहना होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.