पॉलिसी और फंड का दमदार तालमेल
विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) में लॉन्च हुई 'Next-Gen Life Sciences Policy 2026-2030' का सीधा लक्ष्य तेलंगाना को एक प्रमुख ग्लोबल लाइफ साइंसेज हब बनाना है। यह नीति केंद्र सरकार के 'Biopharma SHAKTI' प्रोग्राम के साथ मिलकर काम करेगी, जिसके लिए अगले 5 साल में ₹10,000 करोड़ का फंड रखा गया है। इस फंड का इस्तेमाल बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स के घरेलू प्रोडक्शन को बढ़ाने के लिए होगा। तेलंगाना का इरादा $25 बिलियन का निवेश आकर्षित करने और 5 लाख नई नौकरियां पैदा करने का है। सरकार का फोकस सिर्फ ज्यादा प्रोडक्शन पर नहीं, बल्कि हाई-वैल्यू थेरेपी (High-value therapy) और इनोवेशन पर है।
निवेश और इकोसिस्टम को मिलेगी रफ्तार
BioAsia 2026 में कई बड़े निवेशों का रास्ता साफ हुआ। फ्रांस की कंज्यूमर हेल्थ कंपनी Opella Healthcare, हैदराबाद में अपने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) का विस्तार कर रही है। वे 42,000 स्क्वेयर फीट की नई फैसिलिटी बना रहे हैं, जिससे करीब 500 नई नौकरियां पैदा होंगी। इसी तरह, इंडोनेशिया की Vaksindo Animal Health, जीनोम वैली (Genome Valley) में एक एडवांस्ड BSL-3 वैक्सीन मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी शुरू करेगी, जो एनिमल हेल्थ (Animal Health) बायोलॉजिक्स पर केंद्रित होगी। मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने भारत फ्यूचर सिटी में GCCs के लिए एक खास ज़ोन बनाने का भी प्रस्ताव दिया है। बता दें कि हैदराबाद का जीनोम वैली 1999 से ही लाइफ साइंसेज के लिए एक बड़ा हब रहा है। तेलंगाना पहले से ही भारत के फार्मा प्रोडक्शन का करीब 35% हिस्सा और दुनिया की एक तिहाई वैक्सीन प्रोडक्शन में योगदान देता है।
आगे की राह और चुनौतियाँ
तेलंगाना की यह नई नीति उसे गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से सीधे मुकाबले में खड़ा करती है, जो पहले से ही फार्मा मैन्युफैक्चरिंग में आगे हैं। जहां गुजरात भारत के फार्मा प्रोडक्शन का 28% से ज्यादा हिस्सा बनाता है, वहीं महाराष्ट्र एक्सपोर्ट में लीड करता है। हालांकि, तेलंगाना का यूएसपी (USP) उसके पास मौजूद US-FDA अप्रूव्ड मैन्युफैक्चरिंग साइट्स और वैक्सीन प्रोडक्शन में उसकी मजबूत पकड़ है। 'Next-Gen Life Sciences Policy' का लक्ष्य 2030 तक तेलंगाना को टॉप 5 ग्लोबल लाइफ साइंसेज क्लस्टर्स में शामिल करना है। इसके लिए सेल एंड जीन थेरेपी (Cell and gene therapies), प्रिसिजन फर्मेंटेशन (Precision fermentation) और नेक्स्ट-जेनरेशन बायोमैन्युफैक्चरिंग (Next-generation biomanufacturing) जैसे एडवांस एरिया पर फोकस किया जाएगा। इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, भारत का बायोटेक्नोलॉजी मार्केट 2030 तक $129 बिलियन से ज्यादा का हो सकता है।
जोखिमों पर भी नजर
एक तरफ जहां तेलंगाना की पॉलिसी और 'Biopharma SHAKTI' पहल से ग्रोथ की उम्मीदें हैं, वहीं कुछ जोखिम भी हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है। राज्य का विदेशी निवेश और GCCs पर ज्यादा निर्भर रहना, ग्लोबल इकोनॉमी में उतार-चढ़ाव या जियो-पॉलिटिकल टेंशन के समय जोखिम खड़ा कर सकता है। साथ ही, नौकरियां पैदा करने और निवेश लाने के बड़े टारगेट की सफलता, हाई-टेक R&D और मैन्युफैक्चरिंग में मुश्किलों, रेगुलेटरी बाधाओं और खास स्किल्स वाले टैलेंट की कमी पर निर्भर करेगी। भले ही हैदराबाद में Amgen, Sanofi और Eli Lilly जैसी बड़ी ग्लोबल फार्मा कंपनियां मौजूद हैं, लेकिन सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग से आगे बढ़कर नए और एडवांस्ड बायोलॉजिक्स को लीड करना एक बड़ी चुनौती है। बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स के प्रोडक्शन में अक्सर बड़ी डेवलपमेंट कॉस्ट और कॉम्प्लेक्सिटी (Complexity) शामिल होती है। इस क्षेत्र में सिर्फ इनोवेशन ही काफी नहीं होगा, बल्कि R&D की गहराई और उसे कॉमर्शियली वायबल (Commercially viable) बनाना ही असली खेल होगा।