Symbiotec Pharmalab अब डबल-चैंबर वाइल मार्केट में एंट्री कर रही है। कंपनी अपने Mhow प्लांट में **₹400 करोड़** का भारी-भरकम निवेश कर रही है ताकि दिग्गज मल्टीनेशनल कंपनियों (MNCs) को चुनौती दे सके। हालांकि, इस विस्तार के चलते कंपनी के शॉर्ट-टर्म मुनाफे और मार्जिन्स पर असर पड़ा है।
बड़ा बदलाव और चुनौती
Symbiotec Pharmalab अब अपने पुराने बिजनेस यानी स्टेरॉयड और हार्मोन API के दायरे से आगे बढ़कर इंजेक्टेबल्स के कॉम्प्लेक्स मार्केट में कदम रख रही है। कंपनी का लक्ष्य डबल-चैंबर वाइल टेक्नोलॉजी में अपनी जगह बनाना है, जिस पर फिलहाल B Braun और Baxter जैसी वैश्विक कंपनियों का दबदबा है। कंपनी ने इसके लिए अपनी पहली जेनेरिक दवा का एप्लीकेशन फाइल कर दिया है और 2027-28 फाइनेंशियल ईयर तक मार्केट शेयर हासिल करने का टारगेट रखा है।
मुनाफे और मार्जिन पर दबाव
इस रणनीतिक बदलाव का असर कंपनी के हालिया फाइनेंशियल नतीजों पर साफ दिख रहा है। हालांकि रेवेन्यू में 7% की ग्रोथ दर्ज की गई है, लेकिन नए निवेश के चलते ऑपरेटिंग खर्च और डेप्रिसिएशन बढ़ गया है। इसी कारण कंपनी के EBITDA मार्जिन पिछले साल के 28% से गिरकर 21% पर आ गए हैं।
बैलेंस शीट और भविष्य की राह
अच्छी खबर यह है कि कंपनी की फाइनेंशियल स्थिति अभी भी स्थिर है। हालिया IPO से मिले फंड ने कंपनी की लिक्विडिटी को मजबूत किया है, जिससे नेट डेट-टू-EBITDA रेशियो 1.1x के सुरक्षित स्तर पर बना हुआ है। कंपनी का अपना पुराना बिजनेस, जिसमें हाइड्रोकोर्टिसोन और टेस्टोस्टेरोन जैसे प्रोडक्ट्स में 75% से अधिक मार्केट शेयर है, अभी भी कैश फ्लो का मुख्य जरिया बना हुआ है।
इसके अलावा, कंपनी अपने CDMO बिजनेस को भी तेजी से बढ़ा रही है। उज्जैन में 400 KL की बायो-मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी शुरू हो चुकी है और 600 KL की अतिरिक्त क्षमता जोड़ने की योजना है। अब निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि क्या कंपनी रेगुलेटरी बाधाओं को पार कर नई लाइन्स से मुनाफा कमा पाती है या नहीं।
