कैंसर की जरूरी दवाओं पर **900%** तक का भारी भरकम मार्कअप देख सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट अब दवाओं के दाम तय करने वाले 'Drugs (Prices Control) Order 2013' की समीक्षा कर रहा है, जिससे फार्मा सेक्टर के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की ऊंची कीमतों पर गहरी चिंता जताई है। सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने एक हैरान कर देने वाला आंकड़ा सामने रखा—एक दवा जो महज ₹2,700 में मिल रही थी, उसे मरीजों को ₹27,000 के MRP पर बेचा जा रहा था। यह 900% का अंतर अब रेगुलेटरी सिस्टम की नाकामी पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
रेगुलेटरी फ्रेमवर्क और प्राइस कंट्रोल
पूरा मामला 'Drugs (Prices Control) Order (DPCO) 2013' के इर्द-गिर्द घूम रहा है। भारत में दवाओं की कीमतें नियंत्रित करने के लिए 'National Pharmaceutical Pricing Authority' (NPPA) जिम्मेदार है। कोर्ट अब यह देख रहा है कि क्या मौजूदा नियम कंपनियों को मुनाफाखोरी से रोकने के लिए काफी हैं या नहीं।
फार्मा कंपनियों के मार्जिन पर क्या होगा असर?
फार्मा सेक्टर में कंपनियां अक्सर ऑन्कोलॉजी (Oncology) जैसे महंगे पोर्टफोलियो से अपना मुनाफा बनाती हैं। यदि सरकार दवाओं पर सख्त प्राइस कैप लगाती है या जेनेरिक दवाओं के इस्तेमाल को अनिवार्य करती है, तो उन कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर सीधा असर पड़ सकता है जो प्रीमियम दवाओं पर निर्भर हैं।
जेनेरिक दवाओं की ओर झुकाव
इस कानूनी लड़ाई का एक बड़ा पहलू डॉक्टरों द्वारा जेनेरिक दवाएं लिखने की अनिवार्यता है। हालांकि यह मरीजों के लिए राहत की बात है, लेकिन यह उन कंपनियों के लिए चुनौती बन सकता है जो महंगे ब्रांडेड ड्रग्स बेचती हैं। वहीं, जेनेरिक मैन्युफैक्चरिंग में मजबूत कंपनियां इसे एक बड़े अवसर के रूप में देख सकती हैं।
आगे क्या?
मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को तय की गई है। निवेशक अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि क्या कोर्ट सरकार को कीमतों के नए स्ट्रक्चर पर पुनर्विचार करने का निर्देश देगा। किसी भी सख्त नियम का असर फार्मा स्टॉक्स की परफॉर्मेंस पर दिख सकता है।
