सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक तीन-सदस्यीय कमेटी बनाने का निर्देश दिया है। यह कमेटी तय करेगी कि क्या 'Uniform Code for Pharmaceutical Marketing Practices' (UCPMP) को अब कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। यह फैसला फार्मा सेक्टर के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
स्वैच्छिक से कानूनी दायरे की ओर बदलाव
8 अक्टूबर, 2026 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता शामिल थे, ने एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। यह आदेश उन जनहित याचिकाओं के जवाब में आया है जिनमें डॉक्टरों को दिए जाने वाले गिफ्ट, इन्सेंटिव और किकबैक जैसी अनैतिक प्रथाओं पर रोक लगाने की मांग की गई थी। अब तक फार्मा कंपनियां UCPMP 2024 के तहत स्वैच्छिक गाइडलाइन्स का पालन करती आई हैं, लेकिन कोर्ट की सक्रियता से साफ है कि अब 'सेल्फ-रेगुलेशन' का दौर खत्म होने की कगार पर है।
कंपनियों के लिए क्या हैं चुनौतियां?
निवेशकों के नजरिए से यह खबर फार्मा कंपनियों के ऑपरेटिंग खर्चों में बड़े बदलाव का संकेत है। कंपनियां अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा डॉक्टरों से जुड़ाव बनाए रखने और मार्केटिंग पर खर्च करती हैं। यदि कमेटी की सिफारिशों के बाद इसे एक कड़े कानून का रूप दिया जाता है, तो कंपनियों को अपनी सेल्स और मार्केटिंग स्ट्रैटेजी में आमूल-चूल बदलाव करना पड़ सकता है। इससे न केवल प्रशासनिक बोझ बढ़ेगा, बल्कि सख्त अनुपालन (Compliance) के कारण प्रॉफिट मार्जिन पर भी दबाव आ सकता है।
अगली सुनवाई पर टिकी नजरें
कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई 29 जनवरी, 2027 के लिए तय की है, जिसमें सरकार को कमेटी के गठन और उसके मैंडेट पर रिपोर्ट पेश करनी होगी। फार्मा सेक्टर के निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी होगी कि सरकारी कमेटी की सिफारिशें कितनी कठोर होती हैं और उनका कंपनियों की मार्केटिंग फ्लेक्सिबिलिटी पर क्या असर पड़ेगा।
