Supreme Court ने कैंसर दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर चिंता जताई है। कोर्ट का मानना है कि 2013 के 'Drug Price Control Order' का पालन नहीं हो रहा है, जिससे प्राइवेट हॉस्पिटल चेन के फार्मेसी मार्जिन पर बड़ा रेगुलेटरी दबाव बन सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की दवाओं की कीमतों को लेकर गंभीर रुख अपनाया है। 29 सितंबर, 2026 को हुई सुनवाई में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सवाल उठाया कि 2013 के 'Drugs (Prices Control) Order' (DPCO) के तहत तय 16% के रिटेल मार्जिन का पालन क्यों नहीं हो रहा है।\n\nकोर्ट ने पाया कि अस्पताल के भीतर की फार्मेसी में मरीजों को दवाएं बाजार रेट से कहीं ज्यादा महंगे दाम पर बेची जा रही हैं। यह 'कैप्टिव मार्केट' का ढांचा मरीजों को तुलना करने या बाहर से दवा खरीदने का मौका ही नहीं देता है।\n\n### हॉस्पिटल सेक्टर पर असर (Impact on Hospital Stocks)\n\nनिवेशकों के नजरिए से यह खबर अहम है क्योंकि भारत की बड़ी प्राइवेट हॉस्पिटल चेन के लिए उनकी फार्मेसी और डायग्नोस्टिक डिवीजन 'हाई-मार्जिन' बिजनेस का जरिया हैं। अगर कोर्ट या सरकार इस पर सख्त नियम बनाती है या मार्जिन कैप लगाती है, तो कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर बुरा असर पड़ सकता है। सरकार ने यह भी माना कि दवाओं की ये बढ़ी हुई कीमतें 'आयुष्मान भारत' जैसी सरकारी योजनाओं के कुल खर्च पर बोझ डाल रही हैं।\n\nइस मामले में अगली सुनवाई 12 अक्टूबर, 2026 को होनी है। अब देखना यह होगा कि कोर्ट के इस रुख के बाद क्या सरकार जेनेरिक दवाओं की अनिवार्यता या फार्मेसी ऑपरेशन्स में पारदर्शिता के लिए कोई कड़े आदेश जारी करती है या नहीं।
