सरकार के सख्त CGHS मानकों ने भारत के डायग्नोस्टिक सेक्टर में दोहरे नियामक ढांचे (regulatory system) पर बहस छेड़ दी है। निवेशकों के लिए, यह बढ़ता कंप्लायंस बोझ बड़े और संगठित लैबोरेटरी चेन के लिए एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है।
भारत के हेल्थकेयर सेक्टर में इन दिनों डायग्नोस्टिक लैब की निगरानी को लेकर एक नई चर्चा छिड़ गई है। जानकारों का कहना है कि CGHS (Central Government Health Scheme) से जुड़ी लैब्स और आम प्राइवेट पैथोलॉजी बाजार के नियमों में काफी बड़ा अंतर है।
नियमों का अंतर और चुनौतियां
CGHS के तहत आने वाली लैब्स के लिए NABL (National Accreditation Board for Testing and Calibration Laboratories) एक्रेडिटेशन अनिवार्य है। इसके अलावा, वहां फुल-टाइम पैथोलॉजिस्ट और अत्याधुनिक उपकरणों का होना जरूरी है। वहीं, सामान्य प्राइवेट लैब Clinical Establishment Rules 2018 के तहत काम करती हैं, जहां नियमों का पालन हर जगह एक जैसा नहीं है। ये नियम काफी लचीले हैं, जहां अनुभवी साइंस ग्रेजुएट्स को स्टाफ के तौर पर रखा जा सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
इन्वेस्टर नजरिए से देखें तो यह रेगुलेटरी माहौल एक 'फिल्टर' की तरह काम कर रहा है। बड़े डायग्नोस्टिक प्लेयर्स पहले से ही NABL मानकों और फुल-टाइम प्रोफेशनल्स के साथ काम कर रहे हैं। ऐसे में CGHS के ये सख्त नियम एक प्रकार का 'एंट्री बैरियर' बन गए हैं। छोटी लैब्स के लिए कंप्लायंस की लागत बढ़ रही है, जिससे उनके मार्केट से बाहर होने या बड़ी कंपनियों के साथ जुड़ने (Consolidation) की संभावना बढ़ गई है।
भविष्य की दिशा
अगर सरकार भविष्य में सभी प्राइवेट सेंटर्स के लिए समान और अनिवार्य NABL एक्रेडिटेशन लागू करती है, तो पूरे सेक्टर के लिए बिजनेस की लागत बढ़ जाएगी। हालांकि, जो बड़ी कंपनियां पहले से ही इन कड़े मानकों का पालन कर रही हैं, उनके लिए यह बदलाव मार्केट में अपनी पकड़ को और मजबूत करने का एक बड़ा मौका साबित हो सकता है।
